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Tuesday, June 1, 2010

कहां है नक्सलियों के हमदर्द

कहां है नक्सलियों के हमदर्द
6 अप्रेल 2010 दंतेवाड़ा का ताड़मेटला कांड 76 बेगुनाह सैन्य जवानों की जान, बीजापुर के आवापल्ली 15 एसपीओ सहित 31 बेगुनाह की जान, सुकमा मे विस्फोट करके 30 जवानों की जान , 28 मई झारग्राम के पास रेलवे ट्रेक पर विस्फोट कर 150 से ज्यादा बेगुनाहों की जान लेकर देश के सबसे बड़े गद्दारों ने यह साबित कर दिया हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ दिल्ली की सत्ता हासिल करना है और इसके रास्ते मे चाहे कितने भी निर्दोषों की जान क्यो ना चली जायें. नक्सली कौन है कहां से आये है अब मै इसे बताने की कोशिश नही करूंगा क्योकि इनके बारे मे लोग पहले भी विभिन्न माध्यमों के बारे मे जान चुके हैं..पशुपति से लेकर तिरूपति तक ये लाल गलियारे स्थापित करना चाहते है और अगर सरकार अब भी कोई कड़ी कार्रवाई करने मे देर करती है तो ये अपने नापाक इरादे मे कामयाब हो सकते है. तालिबानी तर्ज पर आतंक मचाने वाले ये दहशतगर्द किस तरह से बैखोफ होकर बेगुनाहों के साथ खून की होली खेलते है. मै छत्तीसगढ़ मे हूं और इस राज्य मे किस तरह नकसलियों ने आतंक फैला रखा है उसे दिल्ली मे बैठे नक्सल तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और संगठन के लोग नही समझ सकते है.सुरक्षा निगरानी संस्थान द इंस्टीटयूट फांर कांफ्लिक्ट मैनेजमेंट की हालिया रिपोर्ट यह बया करती हैं कि नक्सलियों 2005 से अब तक 1680 नागिरक और 990 जवानों को मौंत की नींद सुला चुके है जिसमे झारग्राम की घटना शामिल नही है. लेकिन तथाकथित मानवाधिकार संगठनों ने कभी भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने की कोशिश नही की है. वो हर पल यही कहते है ये अपने लोग है सरकार द्वारा अपनायी गयी दमनकारी नीतियों के खिलाफ उन्होने बंदूके उठा रखी है. मेरा मानना है कि जब तक असमान विकास और लालफीतासाही जारी रहेगी तब तक असंतोष पैदा होगा. भारत मे हो रहा विकास असमान है इस बात से शायद ही कोई इंकार करे. लेकिन इसका ये मतलब नही है कि आप बेगुनाहों का खून बहाने वालो को बौद्धिक रूप से समर्थन करे,सरकार पर ये दबाव बनाये कि वो नक्सलियों के खिलाफ आपरेशन ग्रीनहंट वापस ले. ये वो मानवाधिकार वादी है जिन्हे नक्सलियों का मर्म तो समझ आता है लेकिन 12 जुलाई 2009 को शहीद हुए राजनांदगांव के एसपी विनोद चौबे की विधवा की टीस नही दिखती है.ये वही लोग है जो संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी पर रोक का समर्थन करते है लेकिन शहीद कभी भी किसी भी सेना के जवानों के परिवार की आपबीती सुनने की तकलीफ नही उठाते है. राजनांदगांव, कांकेर,बीजापुर,बस्तर के इलाके मे नक्सली अपना दहशत फैलाने के लिए भोले भाले ग्रामीणों के बीच जन अदालत लगाते है और इन्ही ग्रामीणों के बीच 4 से 5 लोगो की बेदम पिटाई करने के बाद धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या कर देते है. क्या ये मासूमों और बेगुनाहों की हत्या नही..लेकिन अरूंधति राय,स्वामी अग्निवेष, जैसे छद्म मानवाधिकार के समर्थकों को नही दिखता है और दिखेगा भी क्यो क्योंकि इन्होने कभी बस्तर मे अपनी रात गुजारी भी नही है जिस दिन स्वामी अग्निवेष, प्रोफेसर यशपाल जैसे लोग जगदलपुर मे शांति जुलुस निकाल रहे थे ठीक उसी दिन नक्सलियों ने लैंडमाइन ब्लास्ट कर 8 बेगुनाहों को मौंत की नींद सुला दी ,क्या मानवतावाद के इस पुरोधा की नींद अब भी नही जागेगी. नग्सल हिंसा के कारण दंतेवाड़ा, बीजापुर,जैसे इलाके मे शिक्षक , डाक्टर भय से अपने काम पर नही जाते है. बस्तर के 40000 हजार क्षेत्र से ज्यादा क्षेत्रों मे नक्सलियों ने लैंड माइन बिछा रखे है. सरकार स्कूल बनवाना चाहती है तो वे उसे गिरा देते है, अस्पताल को विस्फोट कर गिरा देते है,मोबाइल टावर को निशाना बनाकर संचार सेवा को ध्वस्त कर देते है तो बताए कि ये भोले भाले आदिवासी कहां जाए. सरकार से अगर शिकायत है तो उसे बताने के लिए अहिंसा का रास्ता अपनाया जा सकता है लेकिन बेगुनाहों का खून बनाकर क्या नक्सली आदिवासियों का भला कर पायेंगे. तथाकथित बौद्धिकवादियों को समझना होगा कि नक्सली का उदेश्य केवल बेगुनाहों का मारना या सरकारी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाना नही बल्कि वे समानांतर सरकार बनाकर वो देश मे अराजकता की स्थिति पैदाकर हिटलर जैसी तानाशाही व्यवस्था लागू करना चाहते है और तब इन मानवतावादियों को कलम चलाने या जुलुस निकालने की स्वतंत्रता नही होगी फिर उनका भी कत्लेआम कुछ इसी तरीके से होगा जिस तरीके से वे निरीह आदिवासियों के साथ खून की होली खेलकर जश्न मनाते है. तथाकथित बौद्धिकवादियों को तो ये पता होगा कि नक्सली 1600 करोड़ रूपये की अवैध वसूली प्रत्येक साल करते है सीधे शब्दों मे कहे तो नक्सली 1600 करोड़ की अवैध वसूली करते हैं ठेकेदारों,ग्रामीणों और सरकार के ब्यूरोक्रेट से करते है क्या तथाकथित मानवतावादियों का ध्यान कभी इस तरफ नही जाता हैं.....शायद जायेगा भी नही क्योकि इनकी दुकानदारी ही सरकार और आदिवासी विरोध के नाम पर चलते है और बकायदा नक्सली चर्चा मे आने के लिए सारे तत्व उपलब्ध कराते हैं . ये बात करना बंद करे कि नक्सली बेगुनाह को निशाना नही बनाते है क्योकि दंतेवाड़ा,बीजापुर, राजनांदगांव और झारग्राम का नरसंहार ये बताता है नक्सली सही मायने मे चाहते क्या है, अगर वे पुलिस को ही निशाना बनाते है तो क्या सीआरपीएफ या पुलिस के जवान इस देश के नागरिक नही हैं क्या इन्हे संविधान ने बराबर से रहने का हक नही दिया है क्या ये सैलरी भारत सरकार की उठाते है और पाकिस्तान के लिए काम करते है. मानवाधिकारवादी समझे कि अगर ये एसी की हवा मे सोते है और दिल्ली मे कनाट प्लेस या मुंबई के गेटवे आंफ इंडिया मे शापिंग का मजा लेते है तो इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ सैना के जवानों के द्वारा सरहदों पर लगातार की जा रही निगेहबानी है ....नक्सली सिर्फ और सिर्फ देश के गद्धार है और आतंक को साम्राज्य कायम ही इनका उदेश्य है. अपने लिए सुरक्षा मजबूत करने के मकसद से लिट्टे और तालिबान के तर्ज पर ये नक्सली बच्चे और मासूमों को बंदूक थामने पर विवश करते है , क्या अरूंधति राय इस पर कुछ लिखना चाहेंगी ......
नक्सलियों के बीच सात दिन तक समय गुजारने वाली अरूंधति राय कभी ये बतायेंगी कि 6 अप्रेल 2010 को नक्सलियों द्वारा किये गये नरसंहार मे मारे गये जवान के घर इन्होने कितना वक्त गुजारा है ,नही गुजारा है और शायद गुजारेंगी भी नही क्योंकि ना तो ये और ना ही इनके करीबी दंतेवाड़ा,गढचिरौली, या झारग्राम मे रहकर पंबगाल या छत्तीसगढ़ के लोगो की रक्षा नही करते है.तुलसीदास जी ने सटीक ही लिखा है
बांझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा...
अरूंधति राय,प्रोफेसर यशपाल या मानवाधिकार के चंद चाटुकार नक्सलियों की पीड़ा को क्या समझेंगे..
समय आ गया है कि देश के दुश्मनों के सफाई के लिए तमाम राजनीतिक या देश से स्नेह रखने वाले संगठन सेना ,सीआरपीएफ,एसपीओ,कोया कमांडो, आईटीबीपी के जवान के साथ आये, दिग्विजय सिंह, या लालू प्रसाद जैसे नेता से हमे उम्मीद है कि अपने सारे राजनीतिक स्वार्थों की तिलांजली देते हुए देश के आंतरिंक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े चुनौती बने नक्सलियों के खिलाफ उठाये गये कदम मे केंद्र और विभिन्न सरकार का साथ दे....
नक्सली सिर्फ देश के गद्धार है जो हिंसा, अराजकता, खून,कत्लेआम, चिखने और चिल्लाने की भाषा को समझते है और शांति ,अहिंसा से इनका दूर दूर तक का कोई संबंध नही है,दुश्मन का साथ देने वाला भी दुश्मन होता है चोर का साथ देने वाला भी चोर होता है और अगर ये बौद्धिकवादी नक्सल हिंसा का समर्थन करते है तो इनकी आवाज को भी सरकार सख्ती से दबा दे
अगर श्रीलंका जैसा छोटा देश लिट्टे के आतंक से मुक्त हो सकता है तो भारत नक्सल हिंसा से मुक्त क्यो नही हो सकता है
आशा है तथाकथित मानवतावादी और छद्मबौद्धिकवादी देश की निरीह,भोली भाली जनता की आवाज को सुन पायेंगे........
नक्सली सिर्फ देश के सबसे बड़े गद्धार है और कठोरता से इसकी हिंसा को सरकार दबा दे ....
..

3 comments:

  1. arundhati ray ,sital jabed jaise jogo ke khate ki jach honi chahiye .
    ye sabhi bidesho ke osare par desh droh kar rahe hai ,inke upar deshdroh ka mukadma chalna chahiye.

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  2. तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा बहुसंख्यकवाद का विरोध एक पुराना फैशन बन चुका है। इससे जहां
    सस्ती लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है..वहीं कई साध्य भी साधे जाते हैं..
    यही कारण है कि आज देश में आरक्षण, मुस्लिम तुष्टिकरण एवं सास्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा करने वाले लोगों को
    साप्रदायिक होने ठप्पा भी लगा दिया जाता है..

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  3. तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा बहुसंख्यकवाद का विरोध एक पुराना फैशन बन चुका है। इससे जहां
    सस्ती लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है..वहीं कई साध्य भी साधे जाते हैं..
    यही कारण है कि आज देश में आरक्षण, मुस्लिम तुष्टिकरण एवं सास्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा करने वाले लोगों को
    साप्रदायिक होने ठप्पा भी लगा दिया जाता है..

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