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Saturday, June 19, 2010

कब सुखेंगे भोपाल के जख्म,क्यों मजबूर हैं हम

कब सुखेंगे भोपाल के जख्म,क्यों मजबूर हैं हम
भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल कुछेक महीने बाद पूरे हो जायेंगे लेकिन पीड़ितों के जख्म पर मरहम लगने की कोई संभावना नजर नही आ रही है ,रही सही कसर 9 जून 2010 की अदालती फैसले ने पूरी कर दी है. इस मामलें मे अदालत कर भी क्या सकती थी क्योंकि सीबीआई ने मामूली धाराएं लगाकर भोपाल गैस के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ केस को कमजोर करने की कोई गुंजाइस नही छोड़ी थी. क्या हम भारतीयों की यही नियती है. सरकारी रिपोर्ट पर ही अगर भरोसा करे तो यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के टैंक नंबर 610 से निकली जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का पानी से मिल जाने के कारण तकरीबन 15 हजार लोगो की मौंत हो गई .जो बच गये उनकी जीवन मौत से भी बदतर हो गया..हालांकि हरेक साल भोपाल और देश के कई दूसरे हिस्से में 3 दिसंबर को गैस पीड़ित लोग धरना प्रर्दशन कर सरकार से इंसाफ की भीख मांगते है लेकिन इससे सरकार की सेहत पर कोई असर नही पड़ता है. सरकार के लिए परिस्थितियां बिल्कुल सहज ही होती अगर टैलीविजन चैनलों पर ये नही दिखाया जाता है कि किस तरह हजारों मौतों का गुनेहगार वारेन एंडरसन नीले कलर के एम्बेस्डर को बड़े शान के साथ सुरक्षित हवाई अड्डे वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा पहुंचाया जा रहा हैं और इसके बाद से ही लोगो के जहन मे ये सवाल उठने लगा कि आखिर इतने बड़े गुनहगार को देश से सुरक्षित बाहर किसने भिजवाया....
जाहिर हैं कि 1984 मे देश के प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी थे और सीएम अर्जुन सिंह थे..कलेक्टर हो या एसपी उनके सामने नेताओं के आदेश के मानने के अलावा कोई विकल्प नही बचता हैं और अगर वारेन एंडरसन भोपाल और दिल्ली से सुरक्षित अमेरिका पहुंच जाता है तो इसमे अर्जुन सिंह और राजीव गांधी की भूमिका पर सवाल तो उठते ही हैं..कितना मजबूर होता है एक भारतीय और उसकी जिंदगी का कितना मतलब कितनी सरकार के लिए होती हैं ये उस समय के राजनेताओं द्वारा किये गये गैर जिम्मेदाराना रूख से स्पषट हो जाता है. भोपाल गैस त्रासदी से पीड़ित लोगो को आज भी इंसाफ का इंतजार है 84 के बाद कितनी सरकारे बदली लेकिन एंडरसन को अमेरिका से वापस लाने की ईमानदार कोशिश किसी भी सरकार ने नही की...जरा कल्पना कीजिए कि अगर अमेरिका में कोई भारतीय कंपनी का मालिक इतनी बड़ी घटना का जिम्मेदार होता तो क्या अमेरिका उस भारतीय को अमेरिका से बाहर निकलने देता..जैविक हथियार रखने के आरोप मे अमेरिका एक देश के पूर्व राष्ट्रपति को सरेआम फांसी देता है और दुनिया मुकदर्शक बनी रहती है. हालांकि सद्दाम हुसैन जो किया उसे माफ नही किया जा सकता है लेकिन जो गुनाह एंडरसन ने किया है क्या उसे इस अपराध के लिए माफ किया जा सकता है. आज ईराक हो या अफगानिस्तान हो इस बात का गवाह हैं कि अमेरिका की नजर में उसके नागरिकों के अलावा दूसरे देश के नागिरकों की जान माल की कितनी फिक्र है. वारेन एंडरसन ने कार पर सवार होने के पहले एक इंटरव्यू मे कहा था
NO arrest no house arrest I am free to leave India
कितना बड़ा तमाचा हमारे देश के नीति नियंताओं पर है...और कितना बड़ा सवाल हमारी न्याय प्रणाली पर भी उठता है. (मैं किसी भी राज्य के न्यायधीशों की नियत पर संदेह नही कर रहा हूं )
सवाल तो कांग्रेस के इरादों और सोनिया गांधी पर भी उठेंगे क्योंकि देश में उस समय कांग्रेस की ही सरकार थी और बगैर केंद्रीय नेतृत्व के संकेत के बिना एंडरसन की सुरक्षित विदाई का रास्ता भोपाल से तय नही हो पाता. प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि वारेन एंडरसन को छोड़ने का निर्णय भोपाल की क़ानून व्यवस्था को ध्यान मे रख कर किया गया था. अब सवाल ये उठता है कि 26 नवंबर 2008 को जब पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब को सेना ने जिंदा पकड़ा था तो क्या उस समय मुंबई की कानून व्यवस्था सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गयी थी.बिल्कुल नही...जनाब कल तक आपकी पार्टी भाजपा को ताने देती थी की आपकी सरकार के विदेश मंत्री आतंकवादियों को विमान मे बैठाकर कांधार ले जाती है लेकिन आपकी सरकार ने तो उस व्यक्ति को देश से बाहर सुरक्षित भेजा है जिस पर 25000 लोगो की मौत की जिम्मेदारी हैं..वैसे कांग्रेस पार्टी विदेशियों को देश से सुरक्षित बाहर और आरोप मुक्त करने मे ज्यादा माहिर है और ओत्तावयों क्वात्रोची का उदाहरण देश के सामने हैं खैर देश और भोपाल को इंसाफ चाहिए ..अगर अमेरिका अपने नागरिकों की जिंदगी बचाने के लिए काबूल और कांधार मे हमले कर सकता हैं तो भारत सरकार को भी भारतीयों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले एंडरसन या डेविड कोलमेन हेडली के प्रत्यर्पण करने के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक मोर्चे पर हर संभव कोशिश करनी चाहिए. भारतीय आष्ट्रेलिया मे पीटते है और हमे आश्वासन के सिवा कुछ नही मिलता है . सवाल सिर्फ भोपाल की घटना को लेकर नही है बल्कि सवाल हमारी विदेश और कूटनीति पर भी जिस पर हमारी सरकार बड़ा गौरावान्वित महसूस करती हैं...लेकिन भारतीय सिर्फ ठगे ही जाते है....

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