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Tuesday, November 25, 2008

कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ

वर्ष २००५ और २००६ के भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। 2005 के लिए हिंदी के प्रख्यात कवि कुंवर नारायण को यह पुरस्कार दिया जाएगा। वर्ष 2006 के पुरस्कार के लिए कोंकणी के रवीन्द्र केलकर और संस्कृत के विद्वान सत्यव्रत शास्त्री को संयुक्त रूप से चुना गया है। शनिवार को यह जानकारी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके मीडिया को दी गई। इससे पहले अभी जल्दी ही कश्मीरी कवि रहमान राही को भी ज्ञानपीठ देने की घोषणा की गई।
कोंकणी और संस्कृत के लिए पहली बार ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया है। पुरस्कार पाने वाले तीनों ही रचनाकार साहित्य अकादमी सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं। हिन्दी में दिए गए ज्ञानपीठ के लिए यही कहा जा सकता है कि कुंवर नारायण को पुरस्कृत कर के ज्ञानपीठ ने अपना ही यश बढाया है।
संस्कृत और कोंकणी भाषा में ज्ञानपीठ पहली बार दिया गया है। कोंकणी भाषा मंडल की स्थापना में रवीन्द्र केलकर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और वे वर्तमान में कोंकणी के सबसे प्रसिद्द और कद्दावर साहित्यकार संस्कृत के विद्वान प्रो. सत्यव्रत शास्त्री ने एक-एक हजार श्लोक वाले तीन महत्वपूर्ण रचनाएं लिखी हैं।
फिलहाल प्रस्तुत हैं कुंवर नारायण की एक कविता जो उनके वैचारिक मंथन को स्पष्ट करती हैं,


बात सीधी थी पर

बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई ।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आये-
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई ।
सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनायी दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।
आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था –
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी ।

हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया ।
ऊपर से ठीकठाक

पर अन्दर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त ।

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?”

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