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Thursday, July 30, 2009

जन्मदिन मुबारक ....!!!


आज हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली समकालीन पार्श्वगायकों में से एक सोनू निगम का जन्मदिन है । मैं यह दावा भी कर सकता हूँ की आज के दौर में वे सर्वश्रेष्ठ भी हैं। आने वाले दिनों में उनका जन्मदिन भी शायद उतना ही बड़ा होगा जितना २४ दिसंबर को रफी साहब का या ४ अगस्त को किशोर दा का । वे उनकी शख्सियत और गायिकी मिल कर उन्हें एक प्यारा गायक बनाती है जैसा शान को उनकी मुस्कुराती हुयी आवाज़ । मैं सोनू को लेकर आग्रही इसलिए भी हूँ क्यूंकि सोनू निगम करियर के लिए संघर्षरत मेरे जैसे कईयों के लिए एक प्रेरणा हैं। वो ख़ुद से बना गायक है , एक आम व्यक्ति जिसके कैरियर की शुरुआत उसी तरह रिवायती ढंग से हुई थी जिस तरह छोटे शहर के ज्यादातर लोगों की होती है....छोटे-छोटे मील के पत्थरों पर आगे बढ़ते ये एक दिन आख़िर बुलंदी का मुकाम पाते हैं, क्लासरूम के उम्दा गायक से लेकर , कॉलेज के मोहम्मद रफी तक , स्टेज शो से जागरण तक, अताउल्लाह खान से रफी साहब के अंदाज़ तक , एल्बम गायक से लेकर मठाधीशों से भिडंत तक और फ़िर अंततः चोटी पर पहुचने तक सोनू निगम बहुत चले हैं , और चल कर सफलता तक पहुचे हैं उन्हें किसी पिता ने सफलता तोहफे के रूप में नही दी ।
जीविका के लिए सोनू ने बेताब जैसी कुछ फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में अभिनय भी किया था। और उनके पिता रफी की शैली के गायक हुआ करते थे जो रफी नाइट्स जैसे कार्यक्रमों के गायक थे । ऐसे ही एक कार्यक्रम में सोनू को पहला मंच मिला और गाना था , क्या हुआ तेरा वादा ? , रफी की शैली जो पिता जी पर थी और उसको बनाए रखने के लिए वे घंटों रफी को सुनते थे, जिससे सोनू में भी रफी की शैली घुल गई । कुछ रफी के कानों में बस जाने के कारण और कुछ पिता जी के प्रभाव से , जो की हर लड़के में थोड़ा थोड़ा आ ही जाता है ... इसी कारण सोनू की गायिकी ने हमेशा कहीं न कहीं रफी की याद दिलाई । रफी की नक़ल के लिए उनकी आलोचना भी खूब हुयी लेकिन इस आलोचना को मैं नई प्रतिभा को डिगाने वाली साजिश के तौर पर ही देखूंगा । आप ज़रा टी सीरीज़ के प्री रेकॉर्डेड केसेट उठा कर सुनिए ... १९ साल का एक लड़का कितनी खूबसूरती से रफी जैसे अजीम फनकार की ऊंचाई पर पहुचने की कोशिश कर रहा है...और कहीं कहीं पर तो असली रफी नकली लग रहे हैं और ये तथा कथित नकली लड़का ही रफी लग रहा है , इस बात को गोपाल दास नीरज की उक्ति से जोड़ कर भी देखा जा सकता है , उन पर जब बच्चन की नक़ल के आरोप लगे तो उनका कहना था की जब आप बचपन से किसी की तरह बनना या करना चाहें तो आपके निखार में भी कहीं न कहीं वो प्रेरणा स्पष्ट होगी आप इसे निश्चित तौर पर नक़ल कह सकते हैं लेकिन इससे पूरी तरह बच पाना मुमकिन भी नही है और एक शिष्य बचना भी नही चाहता ।
सोनू के लिए भी रफी भगवान् का दर्जा रखते हैं और सोनू पर उनका प्रभाव अब अनायास ही है...कम से कम रफी के दूसरे क्लोन की तरह(शब्बीर,अज़ीज़) की तरह उन्होंने रफी की आवाज़ की नक़ल के चाकर में सुरों से समझौता नही किया , उन्होंने रफी के अंदाज़ को अपनाया और उसे अपनी आवाज़ देकर एक नई गायिकी के आयाम उत्पन्न किए जिसमें अंदाज़ और आवाज़ दोनों का माधुर्य था और आज के नए गायक इस तरह की गायिकी के लिए सोनू को जेहन में रख कर रियाज़ कर रहे हैं ...उनके लिए सोनू एक विशुद्ध मौलिक अंदाज़ हैं जहाँ तक वे पहुचना चाहते हैं और हो सकता है की इसी मशक में उन्हें कोई नया रास्ता मिल जाए । बशीर बद्र ने एक बार मुझसे कहा था की इंसान उम्र भार केवल प्रैक्टिस करता है । एक लम्बी प्रैक्टिस के बाद सोनू के गाने सतरंगी रे, साथिया , सोनिया, गुमशुदा आदि कहीं से रफी की कॉपी नही लगते बस सोनू की अपनी पूंजी लगते हैं ।
यहीं से सोनू की एक और खासियत उनकी प्रयोग धर्मिता की बात भी शुरू होती है , शायद इस गुन की प्रेरणा भी उन्हें रफी साहब से ही मिली होगी । रफी के बाद मैं उन्हें सबसे वैविध्य वाला मानता हूँ गायिकी के तौर पर भी , अंदाज़ के तौर पर भी और आवाज़ के तौर पर भी .... आप सुनिए हद कर दी आपने का .... बेकरार .....परदेस का दिल.../ धीमे गाने, तेज़ गाआने , भारतीय रंग , पश्चिमी तर्ज़, भजन ,कव्वाली ,पॉप सभी कुछ गाते हैं और आप चाहें तो इसे अतिशयोक्ति मान सकते हैं लेकिन रोते हुए गाने में उनका कोई जोड़ नही है ।
१९९१ में जब सोनू अपने पिता अगम निगम के साथ मुंबई आए थे तो सबसे पहले उन्हें रोने वाले गाने मतलब आताउलाह खान के ट्रेजिक नज्में मिलीं थीं जिन्हें हमारे अवध में मैय्यत के मगमें कहा जाता है और दिलजले आशिकों की ये पहली पसंद होते हैं ... अगर आपने इन्हे नही सुना है तो लखनऊ के किसी भी टेंपो में एक बार बैठिये आप इनका मज़ा ज़रुर समझेंगे। इन गानों की मैं कभी कभी आलोचना भी कर देता हूँ की ये कुछ ज्यादा ही निराशवादी हैं ... हर जगह मृत्यू को ही उपाय माना गया है लेकिन सच है की आलोचना करना आसन है , हो सकता है की किसी व्यक्ति के लिए सचमुच मौत ही एक मात्र विकल्प रह गे हो और तब उसने ये गीत लिखें हों ... इसीलिए इतने निराशावादी क्षणों को स्वर देना भी आसन बात नही है जिसमें आप मौत को पुकार रहे हों ....आप के सीने का दर्द आपके स्वर में दिखना चाहिए और इन गीतों में सोनू निजाम ने उसे न सिर्फ़ दिखाया है बल्कि दूसरों को महसूस भी करवाया है , कहीं कहीं पर रोते हुए उनकी आवाज़ चोक भी हो गई है ,सामान्यतः गैर-स्तरीय माने जाने वाले इन गानों में आपको १९ साल के सोनू के अद्भुत स्तर का पता चलेगा ।
आज कल सोनू कम गा रहे हैं , या उनके आलोचकों की जुबां में कहें की उन्हें गाने नही मिल रहे , लेकिन हमें ये याद्क रखना चाहिए की गायिकी में हमेशा दौर चलते हैं , एक दौर में रफी को भी गीत कम मिल रहे थे जबकि वो निर्विवाद महान्तान्म हैं , उसी तरह एक दौर में हिमेश जैसा कर्कश लोगों को भा रहा था...इसलिए सोनू कम गा रहे हों लेकिन वो कमतर बिल्कुल नहीं हैं ...

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