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Sunday, August 9, 2009

62 साल खुद के.....

अपने...और हम सब के कुछ ही दिन बाद बासठ साल पूरे होने वाले हैं.....62 साल सपनों के...आशाओं के...बदलाव के...स्थायित्व के...परम्पराओं के और मज़बूत होने के 62 साल तो वर्जनाओं के टूटने के भी रहे ये 62 साल....और आज हम केव्स संचार पर शुरु कर रहे हैं अपनी विशेष श्रृंखला जो आज़ादी की 63वीं वर्षगांठ तक यानी कि 15 अगस्त तक चलेगी....
कोई 62 साल पहले एक रात एक ज़मीन के टुकड़े के दो टुकड़े कर के दो मुल्क बना दिए गए...कई साल से अपनी मातृभूमि की आज़ादी के लिए चल रहे एक संघर्ष की ये दुखदायी सफलता थी....और तब से आज तक ये मिश्रित ही है....एक संघर्ष जो केवल अपनी ज़मीन की आज़ादी नहीं बल्कि ज़मीर की आज़ादी के लिए भी था....बंधनों को तोड़ने की वो आकांक्षा केवल इस नाते नहीं थी कि पराधीन को सुख नहीं है...बल्कि इस लिए भी कि स्वाधीन रह कर दुख झेलना भी ज़्यादा सुखदायक है....आज़ादी के फायदों से ज़्यादा सुकून, आज़ाद होने की भावना देती है....उस संघर्ष में करोड़ों देहों से स्वेद बिंदु ही नहीं...अश्रु और रक्त भी बह गए...पर एक बार अपने घर की इमारतों पर अपने देश का झंडा बिना किसी डर के लहरा देने का आनंद सृष्टि के किसी भी और सुख से अलग और अनूठा है...और वो सुख मिला हमको 1947 की उस मध्यरात्रि के बाद से.....
दरअसल ये भी ज़रूरी नहीं कि हम बार बार उन कारणों की तह में जाएं कि हम क्यों गुलाम बने...और वस्तुतः जब हम गुलाम हुए तब हम आज़ाद थे भी नहीं....देश छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था....जो आपस में लड़ती रहती थी...और कम से कम गुलामी का इतना फायदा ज़रूर हुआ कि हम में अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ जो चेतना पैदा हुई, उसी ने हमको एक ही राष्ट्रवाद की भावना से भी भर दिया...और संविधान की प्रस्तावना से भी करीब एक शताब्दी पहले अखंड भारत का सृजन हो गया था..कागज़ों पर नहीं तो मन में ही सही....
आज से हम केव्स संचार पर अपनी आज़ादी की स्मारक श्रृंखला प्रारंभ कर रहे हैं...इसका भी एक विशेष कारण है। दरअसल आज 9 अगस्त है, और शायद आप में से कुछ को याद हो कि 1942 में इसी दिन भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई थी....वो ऐतेहासिक आंदोलन जिसमें जब गांधी नाम के एक क्षीणकाय शख्स ने धीमे स्वर में कहा कि 'करो या मरो' तो पूरे देश की जनता ने 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' की हुंकार से आखिरकार देश को आज़ाद करा कर ही दम लिया....और इस नाते हमको लगा कि विशेष श्रृंखला शुरु करने का इससे बेहतर कोई दिन नहीं....
दरअसल पिछले 6 दशकों में हमने एक समुद्र की तरह तमाम तरह की स्थितियां देखी....कभी गंभीर चुप्पी देखी...तो कभी चुप्पी के बाद का तूफान देखा...कभी लहरें केवल ज़ोर मार कर पीछे हट गई..तो कभी सुनामी भी आई....ज्वार भी था और भाटा भी....एक ओर जब हम तरक्की करना शुरु कर रहे थे...तो पड़ोसी हम पर लगातार युद्ध थोप रहे थे...हम फिर भी तरक्की करते रहे...हम भारतीय हमेशा की तरह विरोधाभासों के साथ जीते आ रहे हैं और यही हमारी खासियत है...एक ओर जब हम 70 के दशक में परमाणु शक्ति बनने की घोषणा कर रहे होते हैं...तो अगले ही साल देश में नागरिकों के मूल अधिकार भंग कर दिए जाते हैं....लग जाता है आपातकाल....जब उदारीकरण की बयार में बहने की बात कर रहे होते हैं तो वैश्विक होते इस देश में कट्टरपंथी सर उठाने लगते हैं...एक ओर शाहबानो प्रकरण देश की आत्मा को झकझोरता है तो दूसरी ओर एक रथयात्रा माहौल बिगाड़ रही होती है....पर हम वैश्विक होने लगते हैं....सुपर कम्प्यूटरों की खोज करते देश में अचानक एक दिन भगवान की मूर्तियां दुग्धपान करने लगती हैं और लोग इसे सच भी मान लेते हैं....पड़ोसी से शांति वार्ता करते करते अचानक पता चलता है कि पड़ोसी घर के भीतर तक घुस कर हमला कर रहा है...और करगिल फिर एक बार देश के युवा रक्षकों का स्मारक बन जाता है....जैसे तैसे हम चांद तक पहुंच जाते हैं...पर चांद को देख कर आज भी 25 करोड़ लोगों को केवल रोटी ही याद आती है...जो रोज़ भूखे सोते हैं....
विरोधाभासों के इस देश में केवल गांधी ही नहीं गोडसे भी हुए हैं...रोज़ भूखा सोने वाला अम्बिका है तो हवाई जहाज़ों में डिनर करने वाले अम्बानी भी है.....अपनी मूर्तियां लगवाने वाली मायावती हैं तो ममता की मूर्ति मदर टेरेसा भी हैं....इस देश में नेता हैं जो जनता को कभी जागने नहीं देना चाहते तो अरुणा राय और अरविंद केजरीवाल भी हैं जो उसे जगा कर ही माने.....यहां ढोंगी बाबाओं के आगे लाखों चढ़ा देने वाले तमाम लोग असली ज़रूरतमंद को हिकारत की निगाह से देखते हैं तो तमाम लोग ऐसे भी हैं जो उनके लिए अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा कर बैठे हैं....दस्यु पैदा करने वाली चंबल घाटी से संत भी निकलते हैं और संतों के आंगन में बलात्कार भी होते हैं....
पर अस्तु भारत जैसा कि मैने पहले कहा एक समुद्र है....तमाम नदियों और उनका शाखाओं को अपने मे ऐसे समाहित करती हुई जैसे मानों वो कभी अलग थी हीं नहीं....और इसीलिए सागर का जल दरअसल मीठा या कड़वा नहीं बल्कि खारा होता है क्योंकि वो मिश्रण है न केवल मीठे का या नमकीन का बल्कि कड़वे का....और सबसे ज़्यादा मात्रा में मिले हैं उसमें आंसू....क्योंकि हम भारतीय बेहद भावुक होते हैं....हम केवल अपनी खुशी पर ही नहीं रोते हैं हम दूसरों के दुख पर भी रोना जानते हैं....हमारी परम्परा और हमारे वर्तमान की सबसे कीमती चीज़ जो हमारे पास है वो है हमारी भावनाएं....प्रबल, प्रखर और प्रभावशाली.....और इस समुद्र मे सबसे ज़्यादा अंश उन्हीं भावनाओं, उन आंसुओं का है...और उसी को नमन करते हुए याद करते हैं वो जो पंडित नेहरु ने देश को आज़ादी मिलते समय अपने प्रसिद्ध वक्तव्य....अ ट्रेस्ट विद डेस्टिनी में कहा था,
Long years ago we made a tryst with destiny, and now the time comes when we shall redeem our pledge, not wholly or in full measure, but very substantially. At the stroke of the midnight hour, when the world sleeps, India will awake to life and freedom. A moment comes, which comes but rarely in history, when we step out from the old to the new, when an age ends, and when the soul of a nation, long suppressed, finds utterance. It is fitting that at this solemn moment we take the pledge of dedication to the service of India and her people and to the still larger cause of humanity.
(बरसों पहले हमने किस्मत से एक वादा किया था...और अब वो वक्त आ गया है कि हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करें, न केवल पूर्ण रुप में या पूरी मात्रा में बल्कि असलियत में....मध्यरात्रि के इस प्रहर में जब दुनिया सो रही है....भारत जीवंतता और स्वतंत्रता के लिए नींद से जाग रहा है...ये एक ऐसा क्षण है जो इतिहास में कभी कभी आता है....जब हम पुराने से नए की ओर जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है और जब सदियों से दबाए गए एक मुल्क की आत्मा को वाणी मिल जाती है...आज इस क्षण हम न केवल भारत और भारत के लोगों बल्कि और बड़े स्तर पर मानवता की सेवा की शपथ लेते हैं.....)
इसी के साथ हम घोषणा करते हैं अपनी स्वतंत्रता दिवस की श्रृंखला की शुरुआत की और आप सब से निवेदित करते हैं आपके आलेख, लेख, चित्र, कविताएं और पत्रों के लिए भी.....क्योंकि सबसे बढ़ कर ये देश उस आम आदमी का है जो खास लोगों को खास बनाता है.......पंडित नेहरु के उस प्रसिद्ध वक्तव्य के साथ आप सबको जय हिंद......

1 comment:

  1. waah bhai ji,
    jhakjhor dene wala aalekh diya hai aapne........
    sachmuch aapki lekhni se bahut sakaratmak parinaam milne ki apekshaayen hain
    aapka abhinandan !
    badhaai ji badhaai !

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