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Thursday, August 13, 2009

झंडा

"गुडिया हल्के हाथ से,फटने न पाए" दो दिन बाद पूरा शहर गोल चौराहे पर आज़ादी की खुशी बांटने के लिए जमा होने वाला था । मंत्री जी मुख्य अतिथि थे । सभी बड़े हर्ष से उस महान दिन का इंतज़ार कर रहे थे । लेकिन सबसे ज्यादा खुशी शायद उन दीन-गरीब बच्चों को थी, जो दिन-रात एक करके कागजी झंडे बना रहे थे। आंखों में कितनी आशा थी। समर्पण इससे आगे नही जा सकता । झंडे के ऐतिहासिक पक्ष को ज्यादा नही जानते थे, लेकिन १५ अगस्त के दिन झंडे का आर्थिक और सामजिक महत्त्व समझने लगे थे । निष्ठा देखने योग्य थी। ध्वज के सम्मान से कोई समझौता नहीं। पता नहीं किस प्रायोजन से , हर झंडा पूरा होने के बाद उसे माथे से लगा लेते थे। और आंखें चमक उठती थीं। ऐसा लग रहा था, मानो ध्वज निर्माण नहीं , "राष्ट्र-निर्माण" हो रहा हो। शायद ऐसा ही कोई दृश्य देख कर नेहरू ने बच्चों को "राष्ट्र-निर्माता" कहा था। लेकिन अगले ही दिन, मंत्री जी ने शाहजहाँ बन कर इन अद्वितीय राष्ट्र शिल्पियों के हाथ काट लिए। अखबार में ख़बर छपी "राष्ट्र ध्वज के सम्मान को ध्यान में रखते हुए , इस बार कागज़ के झंडे पर रोक" लेकिन बाहरी दुनिया से बेसुध भल्लू , अभी भी झंडे को माथे से लगाये , कह रहा था...."गुडिया हल्के हाथ से,फटने न पाए"

2 comments:

  1. पहले भी पढ़ चुका हूं पर हर बार उतनी ही अच्छी लगती है....ये लघुकथा लाजवाब है....

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