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Thursday, August 13, 2009

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा (अतिथि लेख)

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक महात्मा गांधी ने ऐसे किसी समारोह में कभी हिस्सा नहीं लिया जिसमें उन्हें आजाद भारत के ध्वज को सलामी देनी पड़े। इस ध्वज में सिर्फ उनकी मृत्यु के बाद उनका शरीर लपेटा गया। महात्मा गांधी इस बात से बहुत नाराज थे कि उनका प्रिय चरखा झंडे पर से हटा लिया गया है और उन्होंने कहा था कि जिस झंडे पर चरखा नहीं होगा उसे वे कभी सलामी नहीं देंगे। भारतीय ध्वज असल में कांग्रेस का ध्वज हैं। महात्मा गांधी ने आजादी मिल जाने के बाद कांग्रेस को भंग करने की सलाह दी थी जिसे माना नहीं गया और कांग्रेस ने गांधी के चरखे को काफी समय तक अपने ध्वज पर बनाए रखा। फिर कांग्रेस के विभाजन हुए तो यह चरखा भी गायब हो गया। आज के सांसद कंप्यूटर का इस्तेमाल जानते हैं मगर चरखे से एक इंच सूत नहीं निकाल सकते।
कम लोग जानते हैं कि देश को आजादी मिलने के बयालीस साल पहले 1905 में स्वामी विवेकानंद की आयरलैंड में जन्मी शिष्या भगिनी निवेदिता ने भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज बनाया था। इसमें 108 दीपक थे, चकमती हुई बिजली थी, कमल था और इस पर वंदे मातरम लिखा हुआ था। कोलकाता के 1906 में हुए कांग्रेस अधिवेशन में इसे मान्यता दे दी गई थी। पहली बार तिरंगे का इस्तेमाल कोलकाता में 7 अगस्त 1906 को बंगाल के विभाजन के खिलाफ बंग भंग आंदोलन में किया गया। इस पर भी सूर्य, चंद्रमा, कमल और वंदेमातरम लिखे हुए थे। उधर भीकाजी कामा नाम की एक भारत प्रेमी जर्मन महिला ने जर्मनी के स्टुटगार्ट शहर में 22 अगस्त 1907 को भारतीय ध्वज का एक नक्शा बनाया।
यह ध्वज ऊपर हरा, बीच में भगवा और सबसे आखिर में लाल रंगा तिरंगा था। हरा रंग इस्लाम के लिए और भगवा हिंदुत्व और बोद्व धर्म के लिए, इस पर भी हिंदी में बीचो बीच वंदेमातरम लिखा था और सूर्य और चंद्रमा भी थे। इस झंडे को वीर सावरकर ने भी मान्यता दी थी। इसे बर्लिन कमेटी झंडे के तौर पर माना गया और प्रथम विश्व युद्व में इस्तेमाल किया गया। खान अब्दुल गफ्फार खान यानी सीमांत गांधी की गदर पार्टी ने भी अपना एक झंडा बनाया था और इस पर बलूचिस्तान में इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार कुखरी का एक जोड़ा प्रमुखता से दिखाया गया था। फिर जब 1917 में अंग्रेजों ने भारत की होम रूल की मांग मान ली तो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और कांग्रेस की पहली अध्यक्ष एनी बेसेंट ने एक और झंडा रचा। इस झंडे में ब्रिटिश झंडे के नक्शे का भी समावेश था और सबसे ऊपर सप्तर्षि तारा मंडल अंकित था। यह झंडा बहुत लोकप्रिय नहीं हो पाया।
कांग्रेस ने 1921 में पहला झंडा बनाया जिसमें गांधी जी का प्रिय चर्खा केंद्र में था। इसके एक साल पहले 1916 में आंध्र प्रदेश के मछलीपटनम जिले के भटलपेनमारु गांव के पिंगाली वैंकेया ने एक राष्ट्रीय ध्वज बनाया था और महात्मा गांधी ने इसे मंजूरी दी थी। गांधी जी ने इस पर भी चरखा अंकित करवा दिया था। इसकी पृष्ठिभूमि लाल और हरी थी मगर बाद में खुद महात्मा गांधी को लगा कि यह ध्वज सभी भारतीय धर्मों का प्रतिनिधित्व नहीं करता इसलिए नया झंडा बनाया गया। नया झंडा भी तिरंगा था। ऊपर सफेद, बीच में हरा और सबसे नीचे काला। इसमें तीनों रंगों की पट्टी में चरखा बना हुआ था। इन्ही रंगों का झंडा आयरलैंड का है और आयरलैंड भी उस समय ब्रिटिश सरकार से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। इस झंडे को सबसे पहले कांग्रेस की अहमदाबाद बैठक में लहराया गया मगर इसे कांग्रेस का आधिकारिक झंडा नहीं बनाया गया।
मगर राष्ट्रीय ध्वज की सांप्रदायिक व्याख्याओं से लोग आम तौर पर सहमत नहीं थे। 1924 में कोलकाता में हुई अखिल भारतीय संस्कृत कांग्रेस ने झंडे में हिंदुओं के प्रतीक के तौर पर भगवा और विष्णु की गदा भी शामिल करने का भी प्रस्ताव दिया गया। गेरुआ रंग भी इसमें शामिल था। इस झंडे का सिख नेताओं ने विरोध किया और कहा कि उनके धर्म का प्रतीक पीला रंग भी इसमें होना चाहिए। कांग्रेस की कार्य समिति ने 2 अप्रैल 1931 को एक फ्लैग कमेटी बनाई और इसमें तय हुआ कि रंग सिर्फ गेरुआ रहेगा और इस पर चरखा अंकित रहेगा।
कांग्रेस ने यह प्रस्ताव नहीं माना। मगर आजाद हिंद फौज ने शुरूआत में इसे स्वीकार कर लिया। कराची में कांग्रेस की बैठक में 1931 में पिंगली वैंकेया के तिरंगे में और सुधार किए गए जिनमें भगवा, सफेद और हरे रंग शामिल थे और चरखा केंद्र में बना हुआ था। इसी बीच आजाद हिंद फौज ने चरखे की जगह अपने झंडे में दहाड़ता हुआ शेर बना दिया और उस पर आजाद हिंद भी लिख दिया। यह महात्मा गांधी की अहिंसा के खिलाफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बगावत थी। आजाद हिंद फौज का यह तिरंगा पहली बार भारत में मणिपुर जीतने के बाद खुद सुभाष चंद्र बोस ने लहराया था। मगर जब आजादी के कुछ ही दिन रह गए तो भारत की संविधान सभा ने राष्ट्र ध्वज तय करने के लिए एक समिति बनाई। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद इसके अध्यक्ष थे और सदस्यों में अबुल कलाम आजाद, सरोजनी नायडू, चक्रवर्ती राज गोपालचारी, कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी और भीमराव अंबेडकर थे।
कमेटी 23 जून 1947 को बनी जब आजादी का दिन तय हो चुका था। आजादी के दिन के एक दिन पहले 14 जुलाई 1947 को तय किया गया कि कांग्रेस के झंडे में ही कुछ मामूली परिवर्तन कर के इसे देश का झंडा बना दिया जाए। गांधी जी का चरखा हटा दिया गया और उसकी जगह सारनाथ संग्राहलय में रखे शेरों के त्रिमूर्ति के शरणों में बने चक्र को शामिल किया गया। यही झंडा था जो 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर लहराया गया था। गांधी जी के साथ इतनी रियायत जरूर की गई कि झंडा सिर्फ खादी के कपड़े पर बनेगा यह कानून में शामिल कर लिया गया। खादी कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संघ से आई और बाद में खादी और ग्रामोद्योग आयोग को यह झंडा बनाने का काम दे दिया गया। पहला भारतीय राष्ट्रीय ध्वज कर्नाटक प्रदेश के धारवाड़ जिले के गारग गांव में बनाया गया था। हर साल अनुमान है कि भारत में 4 करोड़ तिरंगे बिकते हैं मगर अब वे प्लास्टिक पर भी आने लगे हैं और संविधान के अनुसार गैर कानूनी है।
पूरी कहानी साफ है। जिस जिसने भारतीय ध्वज की परिकल्पना की उसने हिंदू मुस्लिम एकता को सबसे ज्यादा ध्यान में रखा। इसीलिए भगवा या गेरुआ रंग रखे गए और मुस्लिमों का पूज्य हरा रंग भी। मगर आखिरकार जो भारत का झंडा अस्तित्व में आया उसमें सभी धर्मों और शांति का प्रतीक सफेद रंग भी था और उसी पर चक्र बनाया गया। चक्र में 24 डंडे हैं और इन्हें तब भारत में मौजूद प्रांतों का प्रतिनिधि माना गया था। अब प्रदेश बढ़ चुके हैं मगर चक्र में 24 ही डंडे है। भारतीय सेना को भी बाद में यह अधिकार मिला कि वह ध्वज का इस्तेमाल कर सके।

आलोक तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, डेटलाइन इंडिया के संपादक और सीएनईबी समाचार चैनल में सलाहकार संपादक के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं)

1 comment:

  1. बेहद ज्ञानवर्धक लेख....माननीय आपका सदैव प्रशंसक रहा हूं....और अभी तक आपके विचारोत्तेजक लेख पढ़ता था पर आज ज्ञानवर्धक लेख भी पढ़ा...शुक्रिया कुछ नया साझा करने के लिए...

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