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Friday, August 28, 2009

साए मैं लोकतंत्र

हमारे देश मैं लोकतंत्र शब्द को प्रेस ने सबसे ज्यादा बार छापा होगा जितना जन संपर्क के विज्ञापन से भी ज्यादा यानि की एंकर का गला भी सबसे ज्यादा बार इसी शब्द को चिल्ला कर ख़राब हुआ होगा। नेता भी सुबह उठकर सबसे पहले आँखे इसी शब्द पर मलते हैं। सवाल बड़ा है की क्या विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान के होते हुए और लोकतंत्र के इतनी बड़ी पैरोकार मीडिया और नेतागणों के होते हुए भी हमारे देश मैं बहस का हॉटमुद्दा रहा है यानि बहस कभी भी ठंडी नही पड़ी चाहें वो चाय की दूकान पर हो या फ़िर पान का खोखा लोकतंत्र गली मुहल्लों मैं चर्चा का मुद्दा है। फ़िर भी हमारे देश मैं लोकतंत्र की मजबूती के लिए तलवारें चलती हैं बूथ कप्चारिंग होती है
एक कहानी पढ़ी थी ना जाने कहाँ पर पढ़ी जरूर थी की एक नेता जी ने कह दिया की मैंने आत्मा की आवाज़ पर अपनी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। अब आत्मा पगली बहुत खुस हुई की मेरी आवाज़ पर भी काम होते हैं, एक दूसरी आत्मा जो पहले किसी और नेता की आत्मा थी उसने कहा पगली पहले बोलकर तो दिखा तेरी अव्वाज़ है कहाँ नेता की आत्मा चीखी पर आवाज़ ही नही निकली वो गूंगी हो चुकी थी।
हम रोज़ दीवारों पर सर दे मारते हैं की हमारा लोकतंत्र डूब रहा है बचा लो इसे। पर बचने क्यों कोई आएगा आप पत्रकार है अपने इसे आपातकाल के सुनामी से बचाया है, भागलपुर और गुजरात के दंगों से बचाया है फ़िर आप इसे क्यों नही बचाते हैं हम बेबस हैं भाई क्योंकि हम पत्रकार हैं हमारा काम लिखना है चुनाव लड़ना नही हम कलम से बखिया उधेड़ सकते हैं या फ़िर राज्य सभा से जाकर राजीव शुक्ला हो सकते हैं हम ख़ुद कुछ नही कर सकते
चलो बहुत बात हुई अस्सिग्न्मेंट से फ़ोन आया था की भोपाल मैं एक मुर्गी ने आदमी के बच्चे को जन्म दिया है पैकेज देना है

फ़िर मिलेंगे तब लोकतंत्र पर चर्चा करेंगे
आशु प्रज्ञा मिश्रा
माखन लाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय

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