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Saturday, August 15, 2009

रोटी, कपड़ा और मोबाइल....62 साल की उपलब्धि...

आज आजादी के बासठ साल हो गए... बासठ साल में दुनिया बदली.. देश बदल गया.. लोग बदल गए...लोगों की जरुरतें बदल गईं.. पहले आम इंसान की बुनियादी जरुरत रोटी कपड़ा और मकान थी लेकिन अब लोगों की बुनियादी जरुरत है रोटी कपड़ा और मोबाइल.. अब मकान की जगह मोबाइल ने ले ली है...छोटा हो या बड़ा.. गरीब हो या अमीर सबके हाथ में दिखता है मोबाइल
रोटी...गोल गोल रोटी कई बार दूर से चांद जैसी दिखती है...और जब पेट भूखा हो तो ये चांद और भी खूबसूरत लगता है...पर आज भी देश के एक तबके को लिए दो जून की रोटी चांद की तरह ही दूर से ही देखने की चीज़ है...एएक मज़ेदार सी परिभाषा सुनिए जो छात्रों को बताती है कि रोटी क्या है....ये परिभाषा कहती है कि रोटी भारत में आटे से बनने वाला एक गोल आकार का खाद्य पदार्थ है....जिसे आग पर भून कर खाया जाता है....और जिसे अंग्रेज़ी में ब्रेड कहा जाता है....पर परिभाषा में कहीं भी ये नहीं बताया जाता है कि रोटी देश के कितने लोगों के लिए दुर्लभ है....और इसे हासिल करने का तरीका क्या है....और शायद देश के लोगों के लिए भी रोटी हासिल करने का तरीका किताब लिखने वालों जितना ही दुर्लभ है...वैसे भी सूखे की मार ने पानी को भी दुर्लभ कर ही दिया है....तो जनाब देश के गरीब आदमी को अब बस हवा का ही सहारा है....यानी कि दाल रोटी खा के नहीं अब बस हवा खा के ही प्रभु के गुण गाने की नौबत बची है....अब इस बात पर इतने भी हैरान मत होइए...क्योंकि कई सालों से आ रहे तमाम सर्वेक्षण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि देश के कई करोड़ लोगों के लिए एक वक्त की रोटी का जुगाड़ मुश्किल है...और नहीं तो क्या आपको लगता है कि ऐसे ही रोटी कपड़ा और मकान के सवालों पर देश में सरकारें बन और गिर जाती हैं.....और नेता ऐसे ही रोजी रोटी के सवालों पर अपनी राजनीतिक रोटियां नहीं सेंक लेते हैं....कुछ ही दिन पहले एक एनजीओ ने एक सर्वेक्षम कराया था जिसमें कहा गया कि देश की लगभग एक चौथाई आबादी रोज़ भूखी सोती है....और इस पर बड़ा हल्ला हुआ...पर हल्ला किया उनलोगों ने जो इन हालातों को सुधार नहीं सकते थे...और जो इन हालातों को सुधार सकते थे....उनके कानों में ये शोर गया ही नहीं....या फिर यूं कह लें कि वो सुनना ही नहीं चाहते थे....खैर हम जिस देश में हैं वहां अगर आंकड़ों को सच मानें तो 25 करोड़ के लगभग लोगों के लिए तो रोटी एक बड़ा सपना है ही....पर दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पांच सितारा होटलों में बैठ कर एक आम आदमी की वार्षिक आय की कीमत का भोजन एक बार में डकार जाते हैं....और बिल चुकाते पर उफ भी नहीं करते हैं...यही नहीं रोटी और रोटी में भी अंतर है....देश में जहां एक मजदूर अपनी एक दिन की सत्तर रुपए दिहाड़ी से घर के 10 सदस्यों को रोटी खिला देता है तो कुछ लोग 700 रुपए की एक रोटी भी खाते हैं....अब ये मत पूछिएगा कि 700 रुपए की रोटी और 70 पैसे की रोटी में अंतर क्या है...क्योंकि जनाब अंतर रोटी का नहीं...अंतर होता है हैसियत का....पर इससे भी मज़ेदार बात ये है कि साहब जब पिज्जा और बर्गर की बड़ी बड़ी दुकानों में जाकर आर्डर देते हैं तो उसके बाद उनकी टेबल देख कर कोई भी कह नहीं सकता है कि देश में अन्न का संकट भी है...और क्या इस देश में कोई भूखा भी सोता होगा... पर फिर भी एक जगह आकर ये हैसियत बराबर हो जाती है...क्योंकि मान्यवर देश के तमाम लोगों की थाली में रोटी भले ही न हो....उनके हाथों में मोबाइल ज़रूर है....और संचार क्रांति का कमाल देखिए कि मोबाइल रखना रोटी खाने से ज़्यादा सस्ता हो गया है...है न तरक्की....और इसी तरक्की को सलाम करती है हमारी आज़ादी की 62 साल की यात्रा कि भैया पेट में भले ही चूहे तांडव करते रहें...थाली में रोटी भले ही न आए पर मोबाइल में सिग्नल ज़रूर आने चाहिए
सवाल है कि आप किसी आदमी के स्तर की पहचान कैसे करते हैं....तो आमतौर पर जवाब यही होता है कि उसके कपड़ों से...और अगर वाकई कपड़ों को किसी व्यक्ति के स्तर का पैमाना बनाया जाए तो फिर तो देश की आधी आबादी का तो कोई स्तर ही नहीं है...और बचे हुए आधे में भी ज़्यादातर का स्तर स्तरहीनता से थोड़ा ही ज़्यादा होगा...क्योंकि मुल्क में केवल 30 फीसदी लोग ही होंगे जो इस हैसियत में हैं कि कपड़ों से स्तर बना और दिखा सकें....बाकी बेचारी गरीब जनता तो हमेशा से तन ढांकने भर को ही कपड़ा पहनती आई है...ज़रा सोचिए जब आप के पास किसी जलसे का आमंत्रण आता है तो आपके मन में पहगला विचार क्या आता है...यही न कि क्या पहन कर जाएंगे...याद करें कि भाई की या दोस्त की शादी के लिए आपके सबसे महात्वाकांक्षी प्लान क्या थे...यही न कि अच्छे से कपड़े बनवाने हैं...दरअसल ये वस्त्र बोध बताता है कि आम आदमी के लिए आज भी अच्छा ओढ़ना पहनना कुछ अवसर विशेष तक ही सीमित है...और फिर देश की गरीब जनता की तो बिसात ही क्या....आज़ादी के बासठ साल बाद भी देश का एक तबका सर्दियों में भी केवल दो कपड़ों में ही ठिठुरता रहता है तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो एक बार की शापिंग में बिना ज़रूरत हज़ारों ही नहीं लाखों रुपए के वस्त्र खरीद डालते हैं....ऐसे लोग भी हैं जिनके तन पर उसे ढंकने लायक भी कपड़े नहीं तो ऐसे लोग भी हैं जो सुबह से शाम तक वक्त और मूड के हिसाब से कपड़े बदलते रहते हैं....अरे अरे बहुत दूर तक जाने की ज़रूरत नहीं है...अब अपने पुराने मंत्री महोदय को ही ले लीजिए...वो तो दिल्ली में बम धमाकों में घायल लोगों से मिलने के लिए भी मौके के हिसाब से कपड़े बदल कर जा पहुंचे थे...पर पता नहीं किसको मंत्री जी की अदा से जलन हो गई और लगा दी नज़र....और ये मंत्री जी उस देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय को संभालते हैं जहां के छोटे छोटे बच्चे गर्म कपड़ों के बिना ठिठुरते हुए सर्दियां गुज़ार देते हैं....पर कुछ भी हो 62 साल में देश ने तरक्की तो बहुत की है...भले ही तन पर कपड़े हों न हों...पर जेब में मोबाइल ज़रूर मिलेगा...न भरोसा हो तो देख लीजिए...इन सभी को...इनके पास पहनने को पूरे कपड़े भले ही न हों...इन सब के पास मौबाइस ज़रूर है....और जब तक ये मोबाइल है...हमारे देश के नेता ये गुरूर ज़रूर पाल सकते हैं कि देश में तरक्की की दशा और दिशा ठीक है...क्योंकि देश में हर आदमी के पास मोबाइल है....फिर चाहें उसके तन पर कपड़ा और मुंह में निवाला न भी हो....
एक भीड़ है जो हर रोज़ उतरती है मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों के रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर....उनके हाथों में होता है उनका बोरिया बिस्तर और आंखों में होते हैं इन शहरों में अपने लिए जगह बना लेने का सपना....इनमें कुछ पढ़े लिखे हैं...तो कुछ अनपढ़....कुछ यहां नौकरी तो कुछ मजदूरी करने आते हैं...पर एक समस्या जो इन सब के साथ है वो है सर छुपाने की जगह की....रहने के लिए मकान शायद आज देश के शहरों की सबसे बड़ी समस्याओं में से है....और शहरों में रहने वाले तमाम परिवार इसके शिकार हैं...हाल ही के सालों में प्रॉपर्टी की कीमतें काफी बढ़ जाने से मकान के किराए भी बढ़ गए और लोगों के लिए मुश्किल हो गया सर छुपाने की जगह ढूंढना....पर ज़रा इनको भी देखिए...एक तबका ये भी है...जो मंहगे आलीशान घरों में रहता है...और जिसको शायद ये पता ही नहीं है कि देश की आधी आबादी के पास रहने के लिए ढंग की जगह नहीं है....मालूम हो भी तो कैसे न तो ये कभी अपने एयरकंडीशन्ड घरों से बाहर निकलते हैं...और न ही अपनी मंहगी गाड़ियों से पैर बाहर रखते हैं...बड़े शहरों की लगभग 40 फीसदी आबादी झुग्गियों में रहती है...और इनको देख कर आप अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं कि आज़ादी को 62 साल हो गए हैं...शायद गांधी का गरीब भारत गांवों से निकल कर शहरों में आ गया है और झुग्गियों में बस गया है....और एक और भारत भी बन गया है जिसके पास वो सारी सुख सुविधाएं है जिसकी उसे ज़रूरत है और वो सुविधाएं भी हैं...जिनकी उसे ज़रूरत नहीं है...पर ज़रा देखिए इनके पास सर छुपाने को सर नहीं है....एक चाल में एक कमरे में एक साथ 12 से 15 लोग रहते हैं...ये झुग्गियों में रहते हैं...और इनको पता ही नहीं कि आज रात सर कहां छुपाएंगे..पर इन सबके पास मोबाइल है...मोबाइल जो है पहचान हमारी 62 साल की तरक्की का...वाहक है विकास के संदेश का...फिर रात फुटपाथ पर ही क्यों न गुज़ारनी पड़े....और यहीं आकर खत्म हो जाती है अमीर और गरीब हिंदुस्तान की दूरियां....क्योंकि जब घर नहीं है तो ज़िंदगी भी मोबाइल है...
पूछा जाए कि वो कौन सी एक चीज़ है जो आज़ादी के बाद के 62 सालों में घर घर तक पहुंच गई है तो शायद सबसे ज्यादा जो जवाब सुनने को मिलेगा वो है...सूचना क्रांति...जी हां देश में ऐसी सूचना क्रांति आई है कि घर घर तक सूचना की आंधी पहुंच गई है...पर ये सब जितना सुखद लगता है उतना शायद होता भी तो बात कुछ और ही होती....क्या कोई विश्वास करेगा कि जिस देश में रोज़ लगभग 25 करोड़ लोग भूखे सोते हैं...वहां 40 करोड़ के करीब मोबाइल फोन उपभोक्ता हैं....पर क्या किया जाए ये सच है....और एक बेहद मज़ेदार सच है....हिंदुस्तान में लोगों की थाली में रोटी नहीं है...पर जेब में मोबाइल है....देश के तमाम हिस्सों में भयंकर सूखा पड़ रहा है...पर जब आप शहर से निकल कर गांवों की ओर बढ़ेंगे तो आपको रास्ते भर सड़क किनारे मोबाइल कम्पनियों की बड़ी बड़ी होर्डिंग्स दिखेंगी....आप जब खेतों में पहुंचेंगे तो तमाम ऐसे किसान दिखेंगे जो कान पर मोबाइल लगाए अपने सम्बंधियों से बात कर रहे होंगे...मतलब जहां तक बिजली नहीं पहुंची है...जहां शिक्षा नहीं पहुंची है...वहां पहुंच गया है मोबाइल....आपको अंदाज़ा भी नहीं हो सकता है कि आपके सामने जो एक फटेहाल शख्स आपको दिख रहा है वो कब अपनी जेब में हाथ डालेगा और निकालेगा एक मोबाइल....और आपकी आंखें अवाक रह जाएंगी....कुछ साल पहले तक मोबाइल जब नया नया आया था...तब मोबाइल फोन रखना बड़े सम्मान की बात होती थी....लोग शान से अपना मोबाइल फोन सार्वजनिक स्थलों पर दिखाते घूमते थे...पर आज ज़रा सोच के देखिए कि क्या वाकई आप इस बात पर इतरा सकते हैं कि आपके पास मोबाइल है....क्योंकि आपके आस पास हर शख्स के पास तो वो है ही न....देश में करोड़ों लोगों के पास एक अदद छत नहीं है...वो फुटपाथों पर या गंदी बस्तियों में शरण पाते हैं..पर उनके पास भी है मोबाइल....जबकि उनके हालात कोई बहुत अच्छे नहीं...इसे संचार क्रांति की महिमा नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे...कि लोगों के पास मकान नहीं है पर मोबाइल है....हिंदुस्तान आज चांद पर पहुंच गया है पर यहां का आम आदमी रोटी की जद्दोजहद में इस कदर डूबा हुआ है कि उसे चांद में भी रोटी ही नज़र आती है....और ऐसे देश में रोटी से ज़्यादा आसान है मोबाइल होना....यही नहीं शिक्षा के क्षेत्र में अपने से छोटे तमाम मुल्कों से पीछे अपने देश में कोने कोने में मोबाइल की दुकानें खुली हैं...पर स्कूल नहीं है.....एक देश में जहां लोगों के तन पर पूरे कपड़े नहीं है..जहां आज भी तमाम बच्चे कड़कती सर्दियों को बिना गर्म कपड़ों के गुज़ारने को अभिशप्त है....वहां हर दूसरे आदमी के हाथ में उंगलियों के अलावा जो चीज़ हमेशा रहती है...वो है मोबाइल....पर सवाल ये उठता है कि आखिर हमारी 62 साल की उपलब्धियां क्या हैं....हमारे देश में 62 साल पहले भी भूख से मौतें होती थी...आज भी होती है....कल भी शिक्षा का हाल बुरा था आज भी अच्छा नहीं है....कल भी समाजिक चेतना का अभाव था, आज भी है....पर क्या आज़ादी के इतने साल बाद भी हमारे पास मोबाइल के अलावा कोई उपलब्धि नहीं जिसे हम गर्व से गिना सकें.....क्या आज़ादी के बाद के 62 सालों में हमने कुछ पाया है तो मोबाइल फोन....और अगर केवल यही पाया है तो ये सवाल महत्वपूर्ण है कि इसे पाने का फायदा क्या है कि हम शिक्षा, समाज सुधार और मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे और हमारे हाथों में मोबाइल आ गए....

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