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Tuesday, December 15, 2009

मीडिया का अंदरूनी लोकतंत्र

पत्रकारिता यानी पांचवां वेद. पत्रकारिता मतलब लोकतंत्र का चौथा खम्भा . पत्रकारिता अर्थात खबरपालिका .पत्रकारिता ज़ुबान है आम जनता की.आनेवाले समय में ना जाने और भी कई उपाधियों से नवाजी जाएगी हमारी पत्रकारिता .आज पत्रकारिता का रंग-ढंग ,रूप,तेवर और कलेवर सब कुछ बदल चुका है. कभी देशभक्ति ,सामाजिक क्रांति ,जोश ,जूनून और जज्बे की मिसाल हुआ करने वाली हमारी पत्रकारिता के संस्कार आज बदल चुके हैं . वर्तमान पत्रकारिता एक उद्द्योग हैं ,एक कारोबार है ,एक पेशा है.अब पत्रकारिता मिशन की नहीं कमीशन की होती है.आज पत्रकारिता नहीं चाटुकारिता होती है .मीडिया में राजनीति का  पूरा-पूरा घालमेल हो चुका है.मीडिया पर व्यापारियों,उद्द्योग्पतिओं ,और राजनीतिज्ञों का कब्ज़ा हो चुका है .हर दिन पत्रकारिता के कायदे -कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं .मीडिया एथिक्स अब बस पत्रकारिता के किताबों में दफन हो कर रह गई है . कुछ सार्थक करने की बजाय ,पत्रकार ब्लाग्बाज़ी करते हैं .इसके माध्यम से एक - दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं. मशहूर होने का नया तरीका ढूंढते हैं. क्या यही है बदलते ज़माने की पत्रकारिता . देश में दुनिया भर के विकास के मुद्दे पड़ें हैं उनपर चर्चा करने और एक मुहिम छेड़ने की जगह फिजूल के काम करते हैं .
खुद को गर्व से लोकतंत्र का चौकीदार कहने वाली के भीतर कई छेद हैं जिनपर पत्रकारिता के ये कर्णधार बात करने से कतराते हैं . दूसरों के विचारों को नया आयाम देने वाली और समस्याओं को उजागर करने वाली मीडिया अपने अन्दर के विचारों को कोई आयाम नहीं दे पा रही है. ये सोचनेवाली बात हैं. ऐसे में भारतीय मीडिया का कई विकारों से ग्रसित होना लाज़िमी है . चौथा खम्भा आज चार गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं . 1. भारतीय मीडिया में भर्तियों का कोई स्पष्ट तरीका नहीं है. 2 .मीडिया में जाति का ज़हर कूट-कूट कर भरा है . 3 . मीडिया में  स्त्री प्रेम बढ़ा है . 4 . मीडिया में जन सरोकार वाली ख़बरों की  लगातार भ्रूण -हत्या हो रही है .
चर्चा करते हैं पहली बिमारी की . 1. गलैमर और शोहरत पाने की चाहत लेकर मीडिया के मैदान में कूदने वाले अनभिज्ञ ,अनजान और आँखों में कुछ कर गुजरने का सपना लेकर आनेवाले युवा और भावी पत्रकारों को जब ये पता लगता हैं की इस क्षेत्र में बिना जुगाड़ के नौकरी नहीं मिलती है तो उनके आँखों से खून के आसूं निकलने शुरू हो जाते हैं . न्यूज़ चैनलों तक पहुचने का एकमात्र रास्ता है जुगाड़ ,अपवाद स्वरुप आईआईएमसी जैसे संस्थानों के बच्चों को छोड़कर . मीडिया में भर्ती का कोई साफ तरीका नहीं है . काम करने का कोई निर्धारित समय नहीं . वेतन तय नहीं है ,जिस चैनल या अखबार को जो मन में आया उतने पैसे में रख लिया नौकरी पर.सुरक्षित भविष्य की कोई गारंटी नहीं . जब मन चाहा कोई भी कारण बताकर निकाल दिया जाता है पत्रकारिता की दुकान से . रिटायरमेंट की कोई पॉलिसी नहीं हैं यहाँ पर . मरते दम तक सम्पादक  बने रहो और हाथ में कलम हिलने लगे तब  तक काम करते रहो. और युवा पत्रकारों के राह की रोड़ा बने रहो. ऐसे ही कुछ हालत हैं भारतीय पत्रकारिता के . स्वतंत्र पत्रकारिता में भी ये युवाओं की जान नहीं बख्शते . वहा ये माजरा है की तुम तो अनुभवहीन लेखक हो तुम्हारी रचनाये कैसे छापें ?.और अगर छाप भी दिया तो एक पैसे नहीं देते . क्या करें, कहाँ जायें ये युवा ? इंटर्नशिप के नाम पर 6 या उससे भी अभिक दिन तक काम कराकर इन युवाओं कोबाहर  का रास्ता दिखा दिया जाता है ये कहकर की तुम तो अभी फ्रेशर हो ? क्या जितने भी पत्रकार आज काम कर रहें है वो क्या शुरुआत से ही काम का अनुभव रखते थे या उन्होंने भी कही से काम की शुरुआत की होगी ?कुकुरमुत्ते की तरह रोज़ नए मीडिया स्कूल और नए चैनल ,अखबार खुल रहे हैं लेकिन जॉब नदारद .जिन्हें मिल भी रहा है उन्हें बिना किसी जुगाड़ के इन्हीं. मीडिया में कैम्पस प्लेसमेंट लगभग १ प्रतिशत होता है .  ये सब बुनियादी बातें आज की मीडिया के सामने बड़े  सवाल के तौर पर खड़ी हैं  ?
मीडिया की दूसरी बीमारी है जाति .पूरे मीडिया पर सवर्णों का कब्ज़ा है .टीवी स्क्रीन , अखबार के सम्पादकीय पन्ने  और उससे भी पेट ना भरा तो ब्लॉग के माध्यम से बड़ी-बड़ी उपदेशात्मक बातें करने वाले ये तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार ,जाने माने पत्रकार और संपादकों ,मैनेजिंग एडिटरों को  तनिक भी इस से इत्त्तिफाक नहीं है खुद के अन्दर की गन्दगी को कैसे साफ़ किया जाए ?मीडिया में दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों आने के पावों के निशान भी नहीं मिलते . तभी तो आरक्षण और अल्पसंख्यक ,गरीबी जैसे मुद्दों पर इनके सवर्णी मानसिकता की साफ़ झलक भी देखने को मिलती है . तंग मानसिकता के लोग क्या पत्रकारिता को पवित्र बनाये रख्नेंगे ये बड़ा सवाल सबके सामने है ? ऐसा लगता है पूरी मीडिया सवर्णों की बपौती है .
मीडिया की तीसरी सबसे बड़ी बीमारी है स्त्री प्रेम . पूरी दुनिया में 42 प्रतिशत महिला पत्रकार हैं .एशिया में २१प्रतिशत महिला पत्रकार हैं .वहीँ भारतीय पत्रकारिता पर पुरूषों का एकाधिकार हैं .भारत में सिर्फ १२ प्रतिशत महिला पत्रकार हैं .अंग्रेजी और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में महिलाओं की तादाद ज्यादा है . लेकिन इनके चयन का आधार योग्यता नहीं सुन्दरता हैं . अपवाद के तौर पर कुछ महिला पत्रकारों को छोड़कर आज भी  कोई महिला पत्रकार ,पत्रकारिता के शीर्ष पर नहीं नहीं पहुच पाई है.चैनलों को बिकाऊ बनाने के लिए सुन्दर-सुन्दर कन्याओं को एंकर और रिपोर्टर के तौर पर पेश किया जाता है ..उन्हें न्यूज़रूम के माहौल में रंगीनियत लाने और बॉस के केबिन को गुलज़ार बनाए रखने के लिए चैनलों में लगातार भरा जा रहा है . अब यही संस्कृति अखबारों में भी तेज़ी से फैल रही है.महिला अधिकारों ,महिला आरक्षण ,वेश्यावृति ,लिंग-भेद जैसे मसले पर चिकनी
-चुपड़ी बातें करने वाले इन बड़े पत्रकारों की सोच की सोच कैसी है भारतीय पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है .आज मेदिअमें काम करने वाली हर महिला पत्रकार कुंठा और असुरक्षा के बीच काम कर रही है . उसके काम में बाधा पहुंचाई जाति है . उसके साथ बातचीत या काम के दौरान द्विअर्थीसम्वादों  का प्रयोग किया जाता है .
मीडिया की  चौथी बिमारी है जन सरोकार के ख़बरों की भ्रूण-हत्या करना . आज की मीडिया के लिए हिरोईनों की चढढ -चोली और बिकनी खबर है .मॉडल का रैम्प पर टोपलेस हो जाना खबर है . सेक्सौर सेंसेक्स खबर है .राखी सावंत की नौटंकी और बिगबॉस का नंगापन खबर है . आत्महत्या करते किसान ,गरीबी ,भुखमरी बेरोज़गारी मीडिया के लिए खबर नहीं है .
आज मीडिया का चरित्र कारोबारी हो चुका है मीडिया का  समाज कारोबारी हो चुका है .एक लोकतान्त्रिक देश में मीडिया का तानाशाह रूप देखने को मिल रहा है .मीडिया के चरित्र का लगातार पतन हो रहा है . मीडिया अपने पावर का सही उपयोग नहीं कर पा रही है .उसके पत्रकार पुलिस और यातायात कर्मचारियों को धमकाने ,आम आदमी को डराने और वसूली करने जैसे कामों में अपनी शक्ति का उपयोग करते हैं . और रौब के साथ हर जगह कहते फिरते है की मैं फलां चैनल या अखबार का पत्रकार हूँ .पत्रकारिता की छवि आज विकृत हो चुकी है उसे सुधरने का काम पत्रकारिता के कर्णधार ही कर सकते है .लेकिन वो अपनी दुकान सजा रहे है उन्हें पत्रकारिता किधर जा रही है उससे कोई मतलबनहीं.
आज एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया , प्रेस इंस्टिट्यूट आफ इंडिया ,प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया जैसे संसथान संपादकों के लिए आराम गाह बन चुके हैं जिस पर बारी-बारी से हर बड़े पत्रकार को बैठाया जाता है .यहाँ के बाब उनके राज्यसभा तक पहुचने के रस्ते खुलते हैं पत्रकारिता कोटे ते तहत . काम के नाम पर ये संसथान बेकार हो गए हैं . इनके रहने नहीं रहने से कोई फर्क नहीं पद रहा है . स्वनियमन-स्वनियमन चिल्लाने वाले ये  मीडिया समूह कभी अपने ऊपर स्वनियमन कर नहीं पाएंगे क्योंकि जैसा बाज़ार उन्होंने तैयार कर दिया है उसे देखकर यह सम्भव नहीं है .
 सबको खबर देने वाले मीडिया और सबकी खबर लेने वाली मीडिया को आज पहले खुद की खबर लेने की ज़रूरत है .मीडिया की ऐसी हालत देखकर मुझे अंग्रेजी की एक कहावत याद आ गई ." डॉक्टर साहब पहले अपना तो इलाज़ कर लीजिये " कहने का अर्थ यह है की अपने को पत्रकारिता का शूरमा कहने वाले जाने-माने पत्रकारों और संपादकों ,मनाजिंग एडिटरों को अपनी बिमारी पर ध्यान देने की ज़रूरत है तभी दूसरों की देखभाल ठीक से कर पाएंगे .



                                                                                                                ओम प्रकाश
                       
                                                                                                                        

2 comments:

  1. कुछ बातों से असहमत पर ज़्यादातर से सहमत...सारे लोग ऐसे नहीं पर अब लगता है काफी ऐसे ही हैं....वर्तनी की कुछ अशुद्धियों को छोड़कर...बहुत अच्छा लिखा है ओपी...आक्रोश को बाहर निकालने का रास्ता ही है ये ब्लॉग....

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