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Sunday, December 20, 2009

दहशतगर्दी , आसाराम बापू , पी.डी.दिनाकरन और तेलंगाना

दुनिया भर में फैल रही दहशतगर्दी एक ऐसा रोग है जो आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा . भारत में लोगों को रोगों कि आदत लग चुकी है लेकिन इलाज़ कम हैं और रोगों के साथ जिंदगी जीने कि मज़बूरी ज्यादा . भारत में दहशतगर्दी के इलाज़ इसलिए कारगर कम है क्योंकि हर चौथा भारतीय अपने आपको वी.आई.पी. की श्रेणी में रखता है . सुरक्षा के नियमों और कानूनों से खुद को ऊपर समझता है. चालान होने की सूरत में हर छुट भैया मोबाइल पर अपनी सिफारिस जुटाता है. हवाई अड्डों पर सिक्यूरिटी चेक अपनी बेईज्ज़ती समझता है. कोई हैरानी नहीं कि हमारे यहाँ आतंकी हमले होते रहेंगे

दिल्ली मुंबई और कोलकाता में रेस्ट हाउस और कोठरियों कि तलाशी चल रही है . देश में हाई अलर्ट जारी किया गया है . क्योंकि देश के प्रमुख हिस्सों में आतंकवादी घुसे हैं ऐसा खुफिया एजेंसी का कहना है . खुफिया खबर ये भी है कि आतंकी तालिबान से ट्रेनिंग लेकर आये हैं .

11 सितम्बर 2001 को अमेरिका पर दहशतगर्दी हमला हुआ और उसी साल 13 दिसंबर को भारत में संसद भवन पर हमला हुआ . अमेरिका में उस हमले के बाद कोई आतंकी वारदात नहीं हुइ है . लेकिन भारत के कई शहरों में आतंकी हमले हुए है . वज़ह साफ़ है कि अमेरिका ने सबक लेकर अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं किया . भारत में भी जब तक सियासत कि जगह सुरक्षा को तवज्जों नहीं दी जाएगी , हालात नहीं सुधरेंगे .

लोकसभा के एक स्पीकर हुआ करते थे , सोमनाथ चटर्जी , वो खुद को इतना भारी भरकम वी. आई.पी. मान बैठे कि लन्दन जाने के लिए सिक्यूरिटी चेक करवाने से इनकार कर दिया. ये इतना शर्मनाक इसलिए है क्योंकि जो लोग खुद को वी. आई.पी. मानते है उन्हें दूसरों के लिए मिसाल कायम करनी चाहिए लेकिन दूसरों को नसीहत देने वाले, प्रवचन देने वाले लोग कानून के घेरे में आते ही कानून तोड़ने की कोशिश करने लगते है . ऐसे ही लोगों में एक नाम है कथा वाचक आसाराम बापू का .सदियों से सुनाई जाने वाली कथा कहानी को अपने अंदाज़ में सुनाने वाले आसाराम बापू के पांडाल में जुटने वाली भीड़ सभी राजनितिक पार्टियों और नेताओं को ललचाती है . शायद इसीलिए आसाराम बापू के खिलाफ मामले को जितनी मांग सी.बी.आई. को सौपने की हो रही है उससे कही ज्यादा कोशिश आसाराम बापू को हर आरोपों से बचाने की हो रही है. संघ परिवार आसाराम को बचाना चाहता है. वज़ह साफ़ है , सन 2004 में मनमोहन सरकार के खिलाफ बी.जे.पी. के एक धरने में जब भीड़ नहीं पहुंची तो आसाराम को बुलाया गया. अपने चेलों को लेकर आसाराम मौके पर पहुंचे और बी.जे.पी. की लाज बचाई . अब बारी आसाराम की लाज बचाने की है . गुजरात ही नहीं मध्य प्रदेश के कुछ आश्रमों में हुए बच्चों की मौत के मामलों में आरोप बापू , उनके बेटे और आश्रम पर है. आसाराम बापू और उसके बेटे पर उसके पुराने सेक्रेट्री राजू चंडोक ने आरोप लगाया कि वो काला जादू करते हैं . जिसके लिए कभी कभी नरबली की ज़रुरत होती है. इसके बदले में राजू चंडोक को तीन गोलियां मार दी गयीं . उधर जिनके बच्चों और परिवार वालों की लाशें आसाराम के आश्रम के बाहर पाई गयी है उन्हें इन्साफ मिलेगा या नहीं ये सवाल कायम है.

एक और मामले में ये सवाल कायम है की इंसाफ मिलेगा या नहीं और ये मामला एक ऐसे जज से जुड़ा हुआ है जिसका काम तो इन्साफ देना है लेकिन ये जज खुद ही कटघरे में खड़ा है . कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस पी.डी.दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग की मुहिम ने जोर पकड़ लिया है ... राज्यसभा के 76 सांसदों ने उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी से मिलकर दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की.... दरअसल दिनाकरन पर आमदनी से ज्यादा ज़मीन जायदाद जुटाने , सरकारी जमीन पर कब्ज़ा करने , हैसियत का गलत इस्तेमाल करने , मनवाधिकार हनन और सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने का आरोप है. संसद के इतिहास में तीसरी बार ऐसा हो रहा है की किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग लाया जा रहा है. अगर जस्टिस दिनाकरन पर लगे आरोप सही होते है तो उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए ताकि मिसाल कायम हो.

अपनी और हाथियों की मूर्तियाँ बनवाने की शौक़ीन उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती स्वर्गीय सरदार बल्लभ भाई पटेल के खिलाफ हो गयी. सरदार पटेल ने छोटे छोटे रजवाड़े को एक में मिला कर भारत को मौजूदा शक्ल दी .लेकिन ये जानते हुए कि हमारी पार्टियाँ परिवारों के कब्जे में है जो नए छोटे मोटे राजे रजवाड़े है. मायावती और छोटे राज्य चाहती है.वैसे मायावती की पार्टी को लोकसभा चुनाव में काफी मार पड़ी . सिर्फ 21 एम.पी. मिले है लेकिन फिर भी जो फैसला पूरे देश के लिए दूरगामी माएने रखते है. उस पर पत्र लिखने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है. मायावती अकेले नहीं है उनके साथ है 5 सांसदों की पार्टी वाले चौधरी अजी सिंह और एक एम.पी. की पार्टी वाले वन मैन पार्टी जसवंत सिंह …. बहाना तेलंगाना

अलग तेलंगाना की लड़ाई 1969 से चल रही है लेकिन इसने इतनी तेजी हाल ही में पकड़ी है. अलग तेलंगाना प्रदेश का झंडा थमने वाले के. चन्द्रशेखर राव 2001 में चंद्रबाबू नायडू के साथ थे. लेकिन जब उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया तो वे अलग तेलंगाना की मांग लेकर टी.डी.पी. से अलग हो गए. फिर 2006 में इसी मसले पर कांग्रेस से अलग हो गए । गए और 2009 में फिर कांगेस के साथ हो गए . दो सांसदों और ग्यारह विधायकों के दम पर चल रही इनकी लड़ाई की आग को बाकी नेता पूरे देश में बड़ी तेजी के साथ फैलाने की कोशिश कर रहे हैं . मायावती ने बुंदेलखंड और हरित प्रदेश देने की बात को कह कर आग और बढा दी है. और फिर कहा की पूर्वांचल भी बनना चाहिए . जिन प्रदेशों के मुख्यमंत्री इतने उदार नहीं है. वहां के उन संगटन में जान आ गयी जो वर्षों पहले अलग राज्य की लड़ाई लड़ कर ख़त्म हो चुके थे. राजस्थान में मरुप्रदेश , बिहार और वेस्ट बंगाल की सीमा पर सीमांचल , पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड , असाम में बोडोलैंड सहित पूरे देश में करीब 10 से ज्यादा राज्यों की मांग चल रही है. सन 2000 में N.D.A. की सरकार ने उत्तराखंड , छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्य बना दिया . बी.जे.पी.खुद को छोटे राज्यों की तरफदार कहती है लेकिन तेलंगाना के मसले पर वह चुप है. क्योंकि तेलंगाना की लड़ाई लड़ने वाले के. चंद्र्शेखेर कांग्रेस के साथ है . ये छोटे राज्यों की बड़ी राजनीती है. आज़ादी से पहले की छोटी छोटी रियासतों की तरफ देश को ले जा रहे नेता ये मसला नहीं उठाते की 1953 के बाद देश में राज्यों के पुनर गटन के लिए नया आयोग क्यों नहीं बना?

2 comments:

  1. आपकी पोस्ट पूरी नही पढ़ पाया कृपया जाँचें.धन्यवाद।

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  2. अभिषेक केवल पोस्ट लिख देना काफी नहीं है...उसकी प्रूफ रीडिंग या कहें उसका प्रिव्यू कर लेना भी ज़रूरी है....ऐसे लिखने का फायदा नहीं अपितु नुकसान है कि लोगों को आधा समझ ही नहीं आया....इसको सही करें...और यह ब्लॉग की छवि के लिए भी नुकसान देह है...आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे...

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