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Wednesday, December 10, 2008

वैश्वीकरण की माया

वैश्वीकरण से मतलब है जन,धन,राजनितीक -सांस्कृतिक,आर्थिक क्रियाओं का दुनिया के देशों में बेरोकटोक प्रवाह. और इसका लक्ष्य है दुनिया के देशों का एक सामान विकास. उदारीकरण,निजीकरण,विनिवेशीकरण,कारपोरेटीकरण इसी का एक हिस्सा है.लेकिन आज हमें भूमंडलीकरण का बिगडा हुआ रूप देखने को मिल रहा है. वैश्वीकरण में पूंजी का महत्त्व होता है.कहने को हम समाजवादी देश है लेकिन १९९० के दशक में हमने भी इसी मॉडल को अपनाया और आज अपना और भी तेजी से इस भूमंडलीकरण के मायाजाल में फंसता नजर आ रहा है. अपने भारत में वैश्वीकरण का मतलब है सेक्स,सेंसेक्स और मल्टीप्लेक्स. छोटे होते कपड़े,मेट्रो ट्रेन की दौड़.मल्टीस्टोरी बिल्डिंग ,मॉल,सेज,माँ को mom ,पिता को डैड कहना,तेज़ रफ़्तार से दौड़ती ज़िन्दगी ये सब कुछ तो वैश्वीकरण की माया है वहीं अमीरी-गरीबी की खाई,बदहाल होती खेती, आत्महत्या करते किसान,भूके मरते लोग, और भीख मांगते बच्चे,मंदी की मार, हत्या,बलात्कार ये भी भूमंडलीकरण का ही माया है. दरअसल इसमें गलती इस मॉडल को अपनाने वाले इसके पैरोंकारों का है जिन्होंने राष्ट्र की स्थिति से ठीक से तालमेल नहीं कर पाये. अचानक सबके लिए बाज़ार को खोलना राष्ट्र जनता पचा नहीं पी क्योंकि ८५ प्रतिशत आबादी गरीबों,अनपढों,देस मध्यमवर्गीय परिवारों का है जो अपनी संस्कृति, सामजिक-आर्थिक परिस्थितियों और पश्चिमी सभ्यता के चक्रव्यूह और उधेड़बून में फंसे हुए हैं.शायद यही वजह है की भूमंडलीकरण के १८ साल बाद भी विकास की स्थिति कुछ खास नही सुधरी है. हाँ इतना जरुर हुआ है की गरीब देस गरीबी भी ग्लोबल हो गई है. देखना दिलचस्प होगा की मंदी के इस बयार के बावजूद वैश्वीकरण से गलबहियां करते हुए हम विकसित होते हैं या फिर हमें अपना घरेलु ढांचा ही मजबूत करना होगा. एक बात तो तय है भूमंडलीकरण से देस का विकास हो न हो लेकिन लोगों के तन-मन का पश्चिमीकरण इससे जरुर हो गया है . ओम प्रकाश (एम्.ऐ .बी. जे ) एम्.सी.यु ,भोपाल

2 comments:

  1. ओम दरअसल यहाँ बात पश्चिमीकरण की नहीं है बल्कि उसके अन्धानुकरण की नहीं है....वैसे तन मन के पश्चिमीकरण की बात से मैं नहीं सहमत हूँ क्यूंकि वह एक सीमित तबके में ही हुआ है पर हाँ यह सच है कि कोई भी मॉडल अपनाने से पहले उसे अपने देश के सामाजिक और आर्थिक ढाँचे के अनुसार ढाल लेना ज़रूरी है जो हमारे यहाँ अक्सर नहीं किया जाता ..... क्यूंकि इसके लिए हमारे नौकरशाहों और नेताओं को म्हणत जो करनी पड़ेगी सो उनसे होगी नहीं !
    अच्छा लेख !

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  2. ओपी भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां वैश्वीकरण का वास्तविक सरोकार आधारभूत चीजों रोटी, कपड़ा और मकान से होना चाहिए। लेकिन यहां वैश्वीकरण के मायने कुछ शहरों, कुछ तबकों या कुछ लोगों तक ही सीमित हैं। वैश्विक स्तर की कम्पनियों द्वारा बनाए घर में रहने की सोचना आम आदमी के लिए दिवास्वप्न देखने के जैसा है.. खाद्य वस्तुओं पर वैश्वीकरण का प्रभाव डिब्बाबंद चीजों तक ही सिमटा है.. रही बात कपड़ा की तो वृहद स्तर पर देखें तो यहां कपड़ा का मतलब रहन-सहन के तौर-तराकों से ही सम्बन्धित हो गया है.. ऐसे में इन तीनों स्तरों पर भारत की उपलब्धियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि यहां वैश्वीकरण का मतलब या तो बेमानी है या काफी हद तक विकास के शब्दकोश का अतिमहत्वपूर्ण शब्द मात्र.. काफी अच्छा लिखने का प्रयास किया है..

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