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Saturday, December 6, 2008

राजनीती,राजनेता और विकास

कहते हैं राजनीती में कुछ भी ग़लत नही होता और आज के भारतीय राजनीती मेंतो बिल्कुल नैतिकता बची ही नहीं है। चारों तरफ़ अनैतिकता,अधर्म,भ्रस्ताचार का बोलबाला है। राजनेताओं के अन्दर देशप्रेम की भावना कूट-कूटके भरी होती थी अब ये गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। १९९० तक तो भारतीयराजनीतिज्ञों की स्थिति थोडी ठीक भी थी लेकिन उसके बाद के १८ वर्षों मेंराजनीती का पुरा परिदृश्य काफी तेज़ी से बदला. हमने आर्थिक उदारीकरण काचोल पहना,आरक्षण की व्यवस्था की गई,बाबरी मस्जिद ढही,जवाब में आतंकवाद काअँधेरा साम्राज्य कायम हुआ, क्षेत्रवाद की राजनीती बढ़ी,दंगे-फसादबढे,अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ी,भुखमरी कुपोषण बढ़ा,हत्या और अपराध बढे,बाहरीऔर आंतरिक सुरक्षा तार-तार हुआ,६२ सालों में पहली महिला राष्ट्रपति भीबनी और इंडिया और भारत भी बना. और इन सबने मौका दिया हमारे राजनेताओं कोखूब लूटने-खसोटने का,जातिवाद'धर्मवाद,क्षेत्रवाद की राजनीती कर वोटबटोरने का. राजनीती का अपराधीकरण हो चुका है.दुनिया में सबसे ज्यादाअपराधियों की शरणस्थली बन चुकी है हमारी विधायिका. पूरे देश मेंधार्मिक,राजनितिक उन्माद पुरे उफान पर है और उसमें मारी जा रही बेकसूरजनता. हमारे नेताओं में तनिक भी बेशर्मी बची ही नही है तभी सब के सब अपनाआत्मसंतुलन खो बैठे हैं और नजाने क्या-क्या उटपटांग बोलते फिर रहे हैजिससे जनभावनाएं आहत हो रही हैं.राजेंद्र प्रसाद,सर्वपल्लीराधाकृष्णन,जयप्रकाश नारायण,लालबहादुर शास्त्री,सरदार पटेलऔर अब्दुल कलामजैसे विचारकों वाले इस देश में आज एक भी योग्य नेता नहीं है जो राजनितिकस्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित,जनहित में काम करे. ऐसे घटियाराजनितिक,सामाजिक संस्कृति के बढ़ने से देश को आर्थिक,सामाजिक-राजनितिकरूप से काफी ज्यादा नुक्सान हो रहा है. नियमों-कानूनों की धज्जियाँ उडाईजा रही है. दल बदल कानून फेल हो गया है. ऐसे में आज जरुरत है स्वास्थ्यराजनितिक विकास की, मानवीयता के विकास की और जब इसका विकास होगा तभीगावों-और शहरों का विकास होगा और जब इन सबका विकास होगा तो पूरे भारत काविकास होगा. इसलिए सबसे पहले लोगों को शिक्षित किया जाए,उनको रोजगारमुहैया कराई जाए और सभी के बीच राष्ट्रप्रेम की भावना विकसित की जाए तभीहम अब्दुल कलाम साहब के सपनो का भारत वर्ष २०२० तक बना पाएंगे वरना इसदेश को इंडिया और भारत के बीच विभाजित होने से कोई नही बचा पायेगा. ओम प्रकाश

1 comment:

  1. मित्र लकीर के फ़कीर दुनिया वैसे भी कम नहीं है उम्मीद आप-से युवाओं नवऊर्जा से लवरेज़ लोगों से ज़्यादा है अगर वे भी इतना लाचारी से भरा लेख जो सिर्फ उनके लेखन प्रदर्शन से ज़्यादा और कुछ ना हो से मुझे बेहद निराशा हुई। ये कौन सी नई बात है कि नेता भ्रष्ट हैं कौन सी नई समस्या है देश में बिखराव बढ रहा है कौन सी नई बात है जो आपने लिखी है मुझे ज़रा बताइये आपने अपने ज़िंदगी के कितने पल दिए हैं इस समस्या से निपटने लिए या समझने के अलावा कुछ और करने में 2020 कलाम ने कह दिया और हम बैठ गये मुँह ताकने के लिए कोई आयेगा शिवाजी जैसा और तलवार घुमायेगा सब ठीक होते चला जायेगा पूरे लेख में कहीं से कहीं तक समाधान नहीं दिखाई दिया या कोई समाधान ढ़ूंढने जैसी चीज़ नहीं दिखाई दी सिर्फ़ समस्या बता कर क्यों आम आदमी को और डरा रहे हो आज़ाद भारत में सबसे ज़्यादा किसी ने अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह मोडा है ते वो है लेखक समाज जो कभी व्यंग्य,लेख कविता से समस्या बताएगा इनमें से एक भी नहीं जो हल बताता हो.....मंच से उतरे कवि जनता के बीच जाकर गाये अपनी कविताएं,कलम कागज़ ऐश्वर्य से बाहर आकर सोचे लेखक,या समस्या पे हंसने के वजाय हंसते हुए हल खोजे व्यंग्यकार तो बात समझ भी आती है नहीं तो यूँ सब्जबाग तो नेता भी दिखाते हैं...लेखक जी समस्या से भरे लेख में हल भी होना चेहिए।।।।।।ऐंसा मेरी एक बड़े भाई होने का नाते आपके लिए विचार है

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