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Wednesday, March 11, 2009

होली पर नजीर अकबराबादी की एक नज़्म

होली भारत में सिर्फ़ एक त्यौहार भर नही है , ये होली के ज़रिये फासले मिटाए जाते हैं , दीवारें गिराई जाती हैं । पूरे साल भर तो हम कुछ और hi बने रहते हैं केवल होली के धमाल में ही हम हम हो पाते हैं .... साम्प्रदायिक लोगों को भी होली मिलन का संदेश देती है .....लखनऊ में वाजिद अली शाह तो गुज़रे ज़माने में होली खेलते थे लेकिन चौक वाला जुलुस अभी भी निकलता है......और नजीर की नज़्म भी अभी बाकी है .... केव्स संचार की तरफ़ से होली और याद रहे कल ईदे मिलादुन्नबी (मुहम्मद साहब के जन्म का दिन ) भी थी.....मुबारकबाद !!!

जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में

।नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।

कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।

खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।

डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।

गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।

कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।

होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।

यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।

डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।

गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।

2 comments:

  1. आभार नजीर अकबराबादी की इस नज़्म का.

    आपको होली की मुबारकबाद एवं बहुत शुभकामनाऐं.
    सादर
    समीर लाल

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  2. नजीर मेरा पंसदीदा शायर हैं होली पा उनकी नज्म याद दिलाने को आभार ।
    होली की हार्दि्क शुभकामनांएं

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