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Tuesday, March 17, 2009

टूटा पहिया

पढ़ें धर्मवीर भारती की एक कविता और सोचें कि दरअसल हमारा व्यर्थ होना भी कहीं एक काम की बात तो नहीं....
टूटा पहिया

मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !

(समय बस आ ही रहा है कि हम सब टूटे पहिये काम आने ही वाले हैं)
धर्मवीर भारती

1 comment:

  1. क्या जाने
    सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !

    लग रहा है ज़िन्दगी की सच्चाईयोँ से मुलाकात होने वाली है

    ReplyDelete

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