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Saturday, October 4, 2008

सड़क पार करने वालों का गीत

इब्बार रब्बी की यह कविता या नज़्म जो भी कहें मुझे बहुत पसंद है.....आप भी गुने ...

महामान्य महाराजाधिराजाओं के
निकल जाएं वाहन
आयातित राजहंस
कैडलक, शाफ़र,
टोयोटा बसें और
टैक्सियाँ और स्कूटर

महकते दुपट्टे
टाइयां और सूट
निकल जाएं ये प्रतियोगी
तब हम पार करें सड़क

मन्त्रियों, तस्करों
डाकुओं और अफ़सरों की
निकल जाएं सवारियां
इनके गरुड़
इनके नन्दी
इनके मयूर
इनके सिंह
गुज़र जाएं
तो सड़क पार करें

यह महानगर है
विकास का
झकाझक नर्क
यह पूरा हो जाए
तो हम
सड़क पार करें
ये बढ़ लें तो हम बढ़ें

ये रेला आदिम प्रवाह
ये दौड़ते शिकारी थमें
तो हम गुज़रें।

4 comments:

  1. यह महानगर है
    विकास का
    झकाझक नर्क
    यह पूरा हो जाए
    तो हम
    सड़क पार करें
    ये बढ़ लें तो हम बढ़ें
    bahut sunder

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  2. सुबह होती है शाम होती है
    उम्र यूँ ही तमाम होती है
    मगर
    विकास का झकाझक नर्क
    समझो यही है जिंदगी का अर्क
    डगर
    सूट वाहन सवारिओं के बाद ही सही
    सड़क से थम के हम पार करें

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  3. इब्बार रब्बी की रचना पढ़कर आनन्द आ गया. बहुत आभार.

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