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Wednesday, October 8, 2008

आतंकवादी श्रोता

आतंकवादियों के महल्ले में
कवि सम्मलेन हो रहा था
हम संचालन कर रहे थे
हाल इतने बुरे थे की
हर कवि मंच पर आने में
घबरा रहा था
और श्रोता थे की
बस घूरे जा रहे थे
न हंस रहे थे
न तालियाँ बजा रहे थे
हमने कहा की भाइयों अब
तालियाँ बजाइए और
कवि सम्मलेन को उठाइए
की एक आतंकवादी श्रोता
बोला आप चुपचाप बैठ जाइये
मंच पर उठाने लायक है ही क्या ?
अब कवियत्री जी को बुलाइए ।

मेरा अनुरोध है केव्स के अपने सभी बड़े भाइयों से क्या यार इस ब्लॉग को अखाडा बना दिया है अरे कभी तो मस्ती में आते हो न । हमेशा वैसे ही रहो । परशुराम की तरह फरसा लेकर टहलना हो तो बात ही अलग है भाई लोग गरमा गरम बहस के बीच मेरी ये कविता चाय ब्रेक बने इसी आशा के साथ
हमेशा आपका ---- आशु प्रज्ञा मिश्र

3 comments:

  1. main bhi aap ki baat se sahmat hoon... lekin kuch chhejein aisee hoti hain jinse peeche nahi hata ja saksta... apni bhavnaon ko jaroor vykkt kar deni chaheeye.. yaha koi akhada nahi hai.. yah bhi ek mudda hai hamesha garm rahne wala mudda... aap bhi shant mat baitheeye is bahas me bhi shamil hoyeeye aur kavita bhi likheeye...

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  2. आशु जी मैं प्रशंसा करता हूँ की आप इतने गंभीर माहौल में भी हमें एक चाय का अवकाश दे रहे हैं.....आपकी शान्ति स्थापित करने की कोशिश का भी मैं कायल हूँ पर दोस्त यह अखाडा नहीं है यह एक वाद है.....एक बहस है
    यह मुद्दा समय की मांग है क्यूंकि देश धार्मिक कट्टरपंथ का शिकार बनता जा रहा है और दिक्कत यह है कि अब सहिष्णु धर्मो में भी नेताओं ने ये आग पहुँचा दी है....
    यह बहस इस को बुझाने के लिए है
    आप पत्रकार हैं ...... आपके पास तर्क हैं तो बहस से क्यों डरना
    जब तक बंधू इस पर बहस नही होगी यह समस्या नहीं सुलझेगी
    हम चाहते हैं कि हमारे कुछ अच्छे मित्र जो कट्टरपंथ और अंधी धार्मिकता के रस्ते पर हैं उन्हें भटकने से बचाने के लिये यह बहस ज़रूरी है
    आप भी इसमे शामिल हों

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  3. may peace prevail on earth.
    shachindra mishra

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