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Friday, October 17, 2008

आज फिर........ करवाचौथ

आज करवाचौथ है......एक कविता जो मन में बचपन से मचलती रही, कागज़ पर आज आ पायी है ! स्वीकारें

आज फिर माँ
सुबह से भूखी है
और हमारी दिनचर्या
वैसी ही है

आज फिर भाभी
रात तक
पानी भी नहीं पीने वाली हैं
भइया चिल्ला कर
पूछते हैं
क्यों मेरी चाय बना ली है ?

आज फिर दीदी
व्रत रखेंगी
जीजाजी की
लम्बी उम्र के लिए
उनको
खांसते खांसते
तीन महीने हुए

सुहागन मरने की
दुआएं करती
आज फिर नानी
अस्पताल में
भूखी हैं
बीमारी के हाल में

आज फिर दादी
सुना रही हैं बहुओं
को करवाचौथ की व्रत कथा
बहुएं भूखी प्यासी हैं
सुबह से
सुनती हैं मन से यथा

आज फिर पत्नी
खाने के लिए
पति का
मुंह देखेगी पहले

आज फिर पति
का दिन
वैसे ही बीता
दफ्तर में
चाय पर चाय पीता

आज फिर बिटिया
को
बाज़ार से दिला लाया टाफी
सोचा जी लो ज़िन्दगी
तुम्हारे करवाचौथ में
वक़्त है काफ़ी

मयंक सक्सेना

4 comments:

  1. आज फिर बिटिया
    को
    बाज़ार से दिला लाया टाफी
    सोचा जी लो ज़िन्दगी
    तुम्हारे करवाचौथ में
    वक़्त है काफ़ी

    सही कहा ..

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  2. बहुत बढिया रचना है।

    ReplyDelete
  3. प्रिय मित्र
    आपकी भावनाओं और रिश्तों से भरी कविता पढी.
    कुछ शब्द भेज रहा हूँ;
    करवाचौथ की लो बधाई ,जिससे कविता कागज़ पर है आज
    धन्य हैं जीवन में ये रस्में,जिनकी यादों से जुड़ कर है समाज
    भाभी रात तक पानी नहीं पीने वाली हैं
    दीदी और नानी तो ऐसे ही जीने वाली हैं
    बहुओं की सुबह से है अपनी अलग ही व्यथा
    पहले सुननी है दादी से करवा चौथ की कथा
    माँ भी आज है सुबह से भूखी
    और बीबी आज नहीं है रूखी
    एक अच्छा पति ही रख पाता है सब यादों में पास
    और उसे ही होता है सबकी भावनाओं का अहसास

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  4. मयंक यार तुम मानो या ना मानो तुम मल्टीटैलेन्टेड तो हो....क्योंकी तुम सबकी भावना कैसै समझ सकते हो..आश्चर्यजनक किन्तु सत्य...
    तुम्हे वो सारी महिलाओ का आशिर्वाद प्राप्त हो जिन्होने भी करवाचौथ का व्रत रखा हो....
    मेरी पत्नी होती तो मै आज मेरी शक्ल दिखलाने की जगह तुम्हारी शक्ल दिखवा देता....

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